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Monday, June 19, 2017

क्या अमेरिकी वैज्ञानिक पूरा सच बोल रहे है बरमुंडा ट्रायंगल के बारे में

http://rahasyamaya.com/reasons-behind-disappearing-ships-aeroplanes-from-bermuda-triangle-kept-secret-by-nasa-scientists-secret-society-members-united-states-of-america-officials-of-real-aliens-movement-riksha-richh-nag/

Monday, June 5, 2017

चीन का Three Gorges बांध जिसने पृथ्वी के घूमने की गति धीमी कर दी | Three Gorges Dam facts

Three Gorges Dam Facts : चीन का थ्री गोर्जेस डैम
– दुनिया का सबसे बड़ा हाइड्रोइलेक्ट्रिक पॉवर प्लांट चाइना में बना हुआ थ्री गोर्जेस डैम है. यह बांध 37 बिलियन डॉलर (करीब 2,38,335 लाख करोड़ रूपए) की लागत से बनकर तैयार हुआ है.
– Yangtze नदी पर बना हुआ थ्री गोर्जेस डैम चीन के Hubei प्रान्त में स्थित है. इस बांध की ऊंचाई 181 मीटर, लम्बाई 2.33 किलोमीटर, चौड़ाई 115 मीटर है. इस बांध को बनाने का मुख्य उद्देश्य बाढ़ की रोकथाम, बिजली पैदा करना है.
– Three Gorges Dam बनाने में 5,10,000 टन स्टील प्रयोग हुआ है. इतने स्टील से 60 एफिल टावर का निर्माण किया जा सकता है. इस बांध के बनने से बिजली बनाने में प्रयोग होने वाले 31 मिलियन टन कोयले की बचत होगी, जिससे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी होगी.
इस बांध में इकठ्ठा किया गया 42 बिलियन टन पानी 175 मीटर की ऊँचाई तक भरा हुआ है. पानी के इतने बड़े भारी जलाशय की वजह से पृथ्वी का जड़त्वाघूर्ण (Moment of Inertia) प्रभावित हो गया है. इसकी वजह से पृथ्वी के घूमने की कुछ गति धीमी हो गयी है.
– पृथ्वी के घूमने की गति धीमी होने से दिन के समय अन्तराल में 0.06 माइक्रोसेकंड्स की वृद्धि हो गयी है मतलब दिन थोड़ा लम्बा हो गया है.
– थ्री गोर्जेस डैम बनने की वजह से उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव अपनी जगह से 2-2 सेंटीमीटर खिसक गए हैं. इसके अतिरिक्त ध्रुवों पर पृथ्वी थोड़ा सा चपटी भी हो गयी है.
– भारत में जिस प्रकार टिहरी बांध बनने से लोगों को विस्थापित करना पड़ा, उसी प्रकार थ्री गोर्जेस डैम बनने से भी कई लोगों को विस्थापित होना पड़ा. थ्री गोर्जेस डैम बनने से 13 शहर, 140 कस्बे और 1600 से अधिक गांव बांध के जलाशय में समा गए. इसकी वजह से करीब 13,00,000 लोगों को पुनर्वासित किया गया.
– चीन का थ्री गोर्जेस डैम अमेरिका के महान हूवर डैम से 11 गुना अधिक बिजली पैदा करता है.
– चीन के इस डैम से निकले 45 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी को छोटे बांधों, सुरंगों, नहरों, पम्पिंग स्टेशन से मदद से 1600 किलोमीटर अपस्ट्रीम के क्षेत्र में प्रवाहित किया जायेगा.
– भारत के लिए थ्री गोर्जेस डैम चिंता का विषय बन सकता है. भारत को आशंका है कि इस बांध के बन जाने से ब्रह्मपुत्र नदी का जलस्तर काफी नीचे गिर जायेगा और पानी में नमक स्तर बढेगा.

Saturday, May 27, 2017

अगर हार्ट अटैक से बचना है तो तुरंत बंद कर दे मलेशिया से इम्पोर्ट यह तेल (Palm Oil)

भारत के तेल बाज़ार मे अब सबसे ज्यादा विदेशी तेल बिक रहा है । आप जानते है एक मलेशिया नाम का छोटा सा देश है, उस देश का एक तेल है जिसका नाम है पामोलिन तेल (Palm Oil). ये पामोलिन तेल सबसे जादा भारत के बाज़ार मे है वो भी लाखो टन । अब पामोलिन तेल का भाव भारत मे आके पड़ता है 20-22 रूपए लीटर (अब 45 रूपए लीटर) और भारत के किसान जो तेल उत्पन्न करके देता है वो है 40 रूपए लीटर (अब 85 रूपए लीटर) । अब भारत का किसान सरसों का तेल पैदा करे 40 रूपए लीटर (अब 85 रूपए लीटर), नारियेल का तेल पैदा करे 60 रुपये लीटर, तिलहन का तेल पैदा करे 90 रूपए लीटर पर पाम तेल का भाव मिलता है 20-22 रूपए लीटर तो सारे तेल बेचनेवाले उद्योगपति धड़ल्ले से लाखों लाखों टन पाम तेल इम्पोर्ट कर रहें है और उस पामोलिन तेल को मिलावट करके आपको बेच रहें है । आप बाज़ार से डिब्बा बंध जितना भी तेल लाके खातें है वो सब पाम तेल है ।
आपको सुनकर हैरानी होगी के 4-5 साल पहले हमारे देश मे ऐसा कानून था के पाम तेल किसी भी दुसरे तेल मे मिलके नहीं बेचा जा सकता GATT करार और WTO के दबाव मे अब कानून ऐसा है के palm तेल किसी भी तेल मे मिलाके बेचा जा सकता है । रिफाइंड और Doubled रिफाइंड तेल के नाम से बाज़ार मे जितना भी तेल मिल रहा है वो सब पाम तेल है ।
इस पाम तेल के दो दुष्परिणाम है –
1. जो जो किसान सरसों, नारियेल, तिल पैदा कटे थे उनको नुकसान क्योंकि उनको अपने तेल का भाव नहीं मिलता।
2. जो पाम तेल खएगा उसको हार्ट अटैक जरुर होगा, क्योंकि पाम तेल मे सबसे जादा ट्रान्स फैट्स है और ट्रान्स फैट्स कभी भी शरीर मे विघटित नहीं होते, किसी भी तापमान पर विघटित नहीं होते और फैट्स जमते जमते जरुरत से जादा हो जाता है तो हृदयघात आता है और आदमी मर जाता है, ब्रेन हेमारेज होता है और आदमी को पक्षाघात होता है, हाइपर टेनशॉन आता है, बिपि होता है । तेल का बाज़ार अब पूरी तरह से विदेशियों के कब्ज़े मे चला गया है।

Friday, May 19, 2017

शुगर रोग कम और षड्यंत्र ज्यादा है

जानिए डायबिटीज का सच, ये बातें डॉक्टर आपको कभी भी नही बताएगा
आजकल शुगर के रोगी इतने ज्यादा बढ़ गए हैं कि हर गली हर मोहले और हर घर में आपको कम से कम एक रोगी तो जरुर मिल ही जाता है। लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि रोज नित नई तकनीक और दवाओं पर हो रहे रिसर्च के बावजूद शुगर रूपी यह राक्षसी रोग बढ़ता ही क्यों जा रहा है।आज का हमारा यह विशेष लेख इसी बात के ऊपर आधारित है ।आज हम इस लेख के द्वारा हमारे सभी मित्रो को डोक्टरो और बड़ी बड़ी दवा कंपनियों के षड्यंत्र के बारे में बताने जा रहे हैं ।आप से अनुरोध है कि इस पोस्ट को थोडा ध्यान से पढ़े और पढ़ने के बाद इसे शेयर करके ज्यादा से ज्यादा लोगो तक इस जानकारी को पहुचाए।Know the truth of diabetes
आइये अब हम मैन मुद्दे पर आते हैं मित्रो क्या आप जानते हैं, 1997 से पहले Fasting Diabetes की limit 140 थी।फिर दवा कंपनियों ने डॉक्टर्स के साथ मिलकर Fasting Sugar की limit 126 कर दी।इससे World Population में 14% Diabetes रोग से पीड़ित लोग बढ़ गए। उसके बाद 2003 में medical Asso. ने फिर से Fasting Sugar की limit कम करके 100 कर दी। यानि फिर से कुल जनसंख्या के करीबन 70% लोग Diabetes माने जाने लगे।डॉक्टर से पूछने पर उनका तर्क होता है कि लोगो का खान पान बदला है ये बात कुछ हद तक सच है लेकिन इतना भी नही बदला कि इतनी ज्यादा संख्या में लोग इसके मरीज हो जाएँ गावों के लोग तो आज भी लगभग वही पुरानी जीवन शैली अपनाकर जी रहें हैं फिर भी शहरों से ज्यादा गावों में शुगर के मरीज हैं
दरअसल Diabetes Ratio या limit को तय करने वाली कुछ Pharmaceutical कंपनियां थीं। जों अपना Business बढ़ाने के लिए यह सब कर रही हैं।
इतना ही नही यह मानव भक्षी कंपनियों ने सिर्फ इतना ही नहीं किया अपितु इन्होंने अपने प्रयोगशालाओं में बनने वाले उपकरणों की सेन्स्टिविटी को इतना अधिक सेट कर रखा है कि जब तक रोगी लास्ट स्टेज पर ना पहुंचे तब तक इनकी रिपोर्ट में सब कुछ नार्मल ही रहता है । क्योंकि यदि रोगी को पता चल गया कि उसे 20 % सुगर है , या 20 % हार्ट ब्लोकेज है तो वह रसोईघर में रखी औषधियों से स्वयं को ठीक हो सकता है ।लेकिन क्या आपको पता है कि
Actually Diabetes कैसे Count करनी चाहिए ?
कैसे पता चलेगा कि आप Diabetes हैं या नहीं ?
पुराने जमाने के इलाज़ के हिसाब से Diabetes Count करने का एक सरल उपाय है ।
आप की उम्र + 100 जी हाँ यही एक सच्चाई है
अगर आपकी उम्र 65 है तो आपका शुगर लेवल भोजन के बाद 165 होना चाहिए ।
अगर आपकी उम्र 75 है तो आपकी भोजन के बाद सामान्य शुगर लेवल 175 होना चाहिए ।
यह होता है उम्र के हिसाब से जैसे – जिसकी उम्र 80 वर्ष है उनकी भोजन के बाद सामान्य शुगर 180 होगी ।
उसके साथ साथ यह भी सच है कि,अगर आपका पाचन तंत्र अच्छा है।आपको कोई टेंशन नहीं है ।आप अच्छा खाना खाते हो,आप जंक फ़ूड , spicy , heavy oily food नहीं खाते ।आप प्रतिदिन योग या प्राणायाम करते हैं और आपका वजन आपकी लंबाई के अनुरूप लगभग बराबर है , तो आपको शुगर नहीं हो सकती है ।यह एक पूर्ण सत्य है। बस टेंशन न लें अच्छा खाना खाएं योग करते रहें ।

Sunday, May 7, 2017

अंडे की हकीकत

अंडे की वह हकीकत जो आपसे छुपाई गई | You Will Never Eat Eggs Again After Reading This*
मादा स्तनपाईयों (बन्दर बिल्ली गाय मनुष्य) में एक निश्चित समय के बाद अंडोत्सर्जन एक चक्र के रूप में होता है उदारहरणतः मनुष्यों में यह महीने में एक बार,.. चार दिन तक होता है जिसे माहवारी या मासिक धर्म कहते है ..उन दिनों में स्त्रियों को पूजा पाठ चूल्हा रसोईघर आदि से दूर रखा जाता है ..यहाँ तक की स्नान से पहले किसी को छूना भी वर्जित है कई परिवारों में …शास्त्रों में भी इन नियमों का वर्णन है
इसका वैज्ञानिक विश्लेषण करना चाहूँगा ..मासिक स्राव के दौरान स्त्रियों में मादा हार्मोन (estrogen) की अत्यधिक मात्रा उत्सर्जित होती है और सारे शारीर से यह निकलता रहता है ..
इसकी पुष्टि के लिए एक छोटा सा प्रयोग करिये ..एक गमले में फूल या कोई भी पौधा है तो उस पर रजस्वला स्त्री से दो चार दिन तक पानी से सिंचाई कराइये ..वह पौधा सूख जाएगा ,
अब आते है मुर्गी के अण्डे की ओर*
१) पक्षियों (मुर्गियों) में भी अंडोत्सर्जन एक चक्र के रूप में होता है अंतर केवल इतना है की वह तरल रूप में ना हो कर ठोस (अण्डे) के रूप में बाहर आता है ,
२) सीधे तौर पर कहा जाए तो अंडा मुर्गी की माहवारी या मासिक धर्म है और मादा हार्मोन (estrogen) से भरपूर है और बहुत ही हानिकारक है
३) ज्यादा पैसे कमाने के लिए आधुनिक तकनीक का प्रयोग कर आजकल मुर्गियों को भारत में निषेधित ड्रग ओक्सिटोसिन(oxytocin) का इंजेक्शन लगाया जाता है जिससे के मुर्गियाँ लगातार अनिषेचित (unfertilized) अण्डे देती है
४) इन भ्रूणों (अन्डो) को खाने से पुरुषों में (estrogen) हार्मोन के बढ़ने के कारण कई रोग उत्पन्न हो रहे है जैसे के वीर्य में शुक्राणुओ की कमी (oligozoospermia, azoospermia) , नपुंसकता और स्तनों का उगना (gynacomastia), हार्मोन असंतुलन के कारण डिप्रेशन आदि …
वहीँ स्त्रियों में अनियमित मासिक, बन्ध्यत्व , (PCO poly cystic oveary) गर्भाशय कैंसर आदि रोग हो रहे है
५) अन्डो में पोषक पदार्थो के लाभ से ज्यादा इन रोगों से हांनी का पलड़ा ही भारी है .
६) अन्डो के अंदर का पीला भाग लगभग ७० % कोलेस्ट्रोल है जो की ह्रदय रोग (heart attack) का मुख्य कारण है
7) पक्षियों की माहवारी (अन्डो) को खाना धर्म और शास्त्रों के विरुद्ध , अप्राकृतिक , और अपवित्र और चंडाल कर्म है

प्याज क्यो काटकर नही रखना चाहिए

*"प्याज "के संबध में महत्वपूर्ण जानकारी -अवश्य पढ़े*
सन 1919 में फ्लू से चार करोड़ लोग मारे जा चुके थे तब एक डॉक्टर कई किसानों से उनके घर इस प्रत्याशा में मिला कि वो कैसे इन किसानों को इस महामारी से लड़ने में सहायता कर सकता है। बहुत सारे किसान इस फ्लू से ग्रसित थे और उनमें से बहुत से मारे जा चुके थे।
डॉक्टर जब इनमें से एक किसान के संपर्क में आया तो उसे ये जान कर बहुत आश्चर्य हुआ जब उसे ये ज्ञात हुआ कि सारे गाँव के फ्लू से ग्रसितहोने के बावजूद ये किसान परिवार बिलकुल  बिलकुल स्वस्थ्य था तब डॉक्टर को ये जानने की इच्छा जाएगी कि ऐसा इस किसान परिवार ने सारे गाँव से हटकर क्या किया कि वो इस भंयकर महामारी में भी स्वस्थ्य थे। तब किसान की पत्नी ने उन्हें बताया कि उसने अपने मकान के दोनों कमरों में एक प्लेट में बिना छिली प्याज रख दी थी तब डॉक्टर ने प्लेट में रखी इन प्याज में से क को माइक्रोस्कोप से देखा तो उसे इस प्याज में उस घातक फ्लू के बैक्टेरिया मिले जो संभवतया इन प्याज द्वारा अवशोषित कर लिए गए थे और शायद यही कारण था कि इतनी बड़ी महामारी में ये परिवार बिलकुल स्वस्थ्य क्योंकि फ्लू के वायरस इन प्याज द्वारा सोख लिए गए थे। 
जब मैंने अपने एक मित्र जो अमेरिका में रहते थे और मुझे हमेशा स्वास्थ्य संबधी मुद्दों पर  बेहद ज्ञानवर्धक जानकारी भेजते रहते हैं तब उन्होंने प्याज के संबध में बेहद महत्वपूर्ण जानकारी/अनुभव मुझे भेजा करते हैं ।  उन्होंने  मुझे  इस कहानी को भेजा। उनकी इस बेहद रोचक कहानी के लिए धन्यवाद। क्योंकि मुझे इस  किसान वाली कहानी के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। जब मैं न्यूमोनिया से ग्रसित था और कहने की आवश्यकता नहीं थी कि मैं बहुत कमज़ोर महसूस कर रहा था तब मैंने एक लेख पढ़ा था जिसमें ये बताया गया था कि प्याज को बीच से काटकर रात में  न्यूमोनिया से ग्रस्त मरीज़ के कमरे में एक जार में रख दिया गया था और सुबह यह देख कर बेहद आश्चर्य हुआ कि प्याज सुबह कीटाणुओं की वज़ह से  बिलकुल काली हो गई थी तब मैंने भी अपने कमरे में वैसे ही किया और देखा अगले दिन प्याज बिलकुल काली होकर खराब हो चुकी थी और मैं काफी स्वस्थ्य महसूस कर रहा था।
कई बार हम पेट की बीमारी से दो चार होते है तब हम इस बात से अनजान रहते है कि इस बीमारी के लिए किसे दोषी ठहराया जाए। तब नि :संदेह प्याज को इस बीमारी के लिए दोषी ठहराया जा सकता है ,प्याज बैक्टेरिया को अवशोषित कर लेती है यही कारण है  कि अपने इस गुण के कारण प्याज हमें ठण्ड और फ्लू से बचाती है अत :वे प्याज बिलकुल नहीं खाना चाहिए जो बहुत देर पहल काटी गई हो और प्लेट में रखी गई हों। ये जान लें कि "काट कर रखी गई प्याज बहुत विषाक्त होती हैं "
जब कभी भी फ़ूड पॉइसनिंग के केस अस्पताल में आते हैं तो सबसे पहले इस बात की जानकारी ली जाती कि मरीज़ ने अंतिम बार प्याज कब खाई थी. और वे प्याज कहाँ से आई थीं ,(खासकर सलाद  में )तब इस बीमारी के लिए या तो प्याज दोषी हैं या काफी देर पहले कटे हुए "आलू "
प्याज बैक्टेरिया के लिए "चुंबक "की तरह काम करती  हैं खासकर कच्ची प्याज। आप कभी भी थोड़ी सी भी  कटी हुई प्याज को देर तक रखने की गलती न करे ये बेहद खतरनाक  हैं यहाँ तक कि किसी बंद थैली में इसे रेफ्रिजरेटर में रखना भी  सुरक्षित नहीं  है। प्याज ज़रा सी काट देने पर ये बैक्टेरिया से ग्रसित हो सकती है औए आपके लिए खतरनाक हो सकती है। यदि आप कटी हुई प्याज को सब्ज़ी बनाने के लिए उपयोग कर रहें हो तब तो ये ठीक है मगर यदि आप कटी हुई प्याज अपनी ब्रेड पर रख कर खा रहें है तो ये बेहद खतरनाक है ऐसी स्थिति में आप मुसीबत को न्योता दे रहें हैं। याद रखे कटी हुई प्याज और कटे हुए आलू की नमी बैक्टेरिया को तेज़ी से  पनपने में बेहद सहायक होता है। कुत्तों  को  कभी भी प्याज नहीं खिलाना चाहिए  क्योंकि प्याज को  उनका पेट का मेटाबोलिज़ कभी भी   नहीं पचाता।
कृपया ध्यान रखे कि "प्याज को काट कर अगले दिन सब्ज़ी बनाने के लिए नहीं रखना चाहिए क्योंकि ये बहुत खतरनाक है यहाँ तक कि कटी हुई प्याज एक रात में बहुत विषाक्त हो जाती है क्योंकि ये टॉक्सिक बैक्टेरिया बनाती है जो पेट खराब करने के लिए पर्याप्त रहता है "

ब्रह्म मुहूर्त में उठने की परंपरा क्यो ?

* ब्रह्म मुहूर्त में उठने की परंपरा क्यों ? *
रात्रि के अंतिम प्रहर के तत्काबाद का समय को ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं। हमारे ऋषि मुनियों ने इस मुहूर्त का विशेष महत्व बताया है। उनके अनुसार यह समय निद्रा त्याग के लिए सर्वोत्तम है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने से सौंदर्य, बल, विद्या, बुद्धि और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। सूर्योदय से चार घड़ी (लगभग डेढ़ घण्टे) पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में ही जग जाना चाहिये। इस समय सोना शास्त्र निषिद्ध है।
ब्रह्म  मुहूर्त यानी अनुकूल समय। रात्रि का अंतिम प्रहर अर्थात प्रात: 4 से 5.30 बजे का समय ब्रह्म मुहूर्त कहा जा सकता है।*
*“ब्रह्ममुहूर्ते या निद्रा सा पुण्यक्षयकारिणी”।*
(ब्रह्ममुहूर्त की निद्रा पुण्य का नाश करने वाली होती है।)
सिख मत में इस समय के लिए बेहद सुन्दर नाम है--*"अमृत वेला"* ईश्वर भक्ति के लिए यह महत्व स्वयं ही साबित हो जाता है। ईश्वर भक्ति के लिए यह सर्वश्रेष्ठ समय है। इस समय उठने से मनुष्य को सौंदर्य, लक्ष्मी, बुद्धि, स्वास्थ्य आदि की प्राप्ति होती है। उसका मन शांत और तन पवित्र होता है।
*ब्रह्म मुहूर्त* में उठना हमारे जीवन के लिए बहुत लाभकारी है। इससे हमारा शरीर स्वस्थ होता है और दिनभर स्फूर्ति बनी रहती है। स्वस्थ रहने और सफल होने का यह ऐसा फार्मूला है जिसमें खर्च कुछ नहीं होता। केवल आलस्य छोड़ने की जरूरत है।
*पौराणिक महत्व* -- वाल्मीकि रामायण  के अनुसार श्रीहनुमान ब्रह्ममुहूर्त में ही अशोक वाटिका पहुंचे। जहां उन्होंने वेद मंत्रो का पाठ करते माता सीता को सुना
शास्त्रों में भी इसका उल्लेख है--
*वर्णं कीर्तिं मतिं लक्ष्मीं स्वास्थ्यमायुश्च विदन्ति।*
*ब्राह्मे मुहूर्ते संजाग्रच्छि वा पंकज यथा॥*
अर्थात- ब्रह्म मुहूर्त में उठने से व्यक्ति को सुंदरता, लक्ष्मी, बुद्धि, स्वास्थ्य, आयु आदि की प्राप्ति होती है। ऐसा करने से शरीर कमल की तरह सुंदर हो जाता हे।
*ब्रह्म मुहूर्त और प्रकृति :--*
ब्रह्म मुहूर्त और प्रकृति का गहरा नाता है। इस समय में पशु-पक्षी जाग जाते हैं। उनका मधुर कलरव शुरू हो जाता है। कमल का फूल भी खिल उठता है। मुर्गे बांग देने लगते हैं। एक तरह से प्रकृति भी ब्रह्म मुहूर्त में चैतन्य हो जाती है। यह प्रतीक है उठने, जागने का। प्रकृति हमें संदेश देती है ब्रह्म मुहूर्त में उठने के लिए।
*इसलिए मिलती है सफलता व समृद्धि*
आयुर्वेद के अनुसार ब्रह्म मुहूर्त में उठकर टहलने से शरीर में संजीवनी शक्ति का संचार होता है। यही कारण है कि इस समय बहने वाली वायु को अमृततुल्य कहा गया है। इसके अलावा यह समय अध्ययन के लिए भी सर्वोत्तम बताया गया है क्योंकि रात को आराम करने के बाद सुबह जब हम उठते हैं तो शरीर तथा मस्तिष्क में भी स्फूर्ति व ताजगी बनी रहती है
*ब्रह्ममुहूर्त के धार्मिक, पौराणिक व व्यावहारिक पहलुओं और लाभ को जानकर हर रोज इस शुभ घड़ी में जागना शुरू करें तो बेहतर नतीजे मिलेंगे।*

ब्रह्म मुहूर्त में उठने वाला व्यक्ति सफल, सुखी और समृद्ध होता है, क्यों? क्योंकि जल्दी उठने से दिनभर के कार्यों और योजनाओं को बनाने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है। इसलिए न केवल जीवन सफल होता है। शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहने वाला हर व्यक्ति सुखी और समृद्ध हो सकता है। कारण वह जो काम करता है उसमें उसकी प्रगति होती है। विद्यार्थी परीक्षा में सफल रहता है। जॉब (नौकरी) करने वाले से बॉस खुश रहता है। बिजनेसमैन अच्छी कमाई कर सकता है। बीमार आदमी की आय तो प्रभावित होती ही है, उल्टे खर्च बढऩे लगता है। सफलता उसी के कदम चूमती है जो समय का सदुपयोग करे और स्वस्थ रहे। अत: स्वस्थ और सफल रहना है तो ब्रह्म मुहूर्त में उठें।
*वेदों में भी ब्रह्म मुहूर्त में उठने का महत्व और उससे होने वाले लाभ का उल्लेख किया गया है।*
प्रातारत्नं प्रातरिष्वा दधाति तं चिकित्वा प्रतिगृह्यनिधत्तो।
तेन प्रजां वर्धयमान आयू रायस्पोषेण सचेत सुवीर:॥ - ऋग्वेद-1/125/1
अर्थात- सुबह सूर्य उदय होने से पहले उठने वाले व्यक्ति का स्वास्थ्य अच्छा रहता है। इसीलिए बुद्धिमान लोग इस समय को व्यर्थ नहीं गंवाते। सुबह जल्दी उठने वाला व्यक्ति स्वस्थ, सुखी, ताकतवाला और दीर्घायु होता है।
यद्य सूर उदितोऽनागा मित्रोऽर्यमा। सुवाति सविता भग:॥ - सामवेद-35
अर्थात- व्यक्ति को सुबह सूर्योदय से पहले शौच व स्नान कर लेना चाहिए। इसके बाद भगवान की उपासना करना चाहिए। इस समय की शुद्ध व निर्मल हवा से स्वास्थ्य और संपत्ति की वृद्धि होती है।
उद्यन्त्सूर्यं इव सुप्तानां द्विषतां वर्च आददे।
अथर्ववेद- 7/16/२
अर्थात- सूरज उगने के बाद भी जो नहीं उठते या जागते उनका तेज खत्म हो जाता है।
व्यावहारिक महत्व - व्यावहारिक रूप से अच्छी सेहत, ताजगी और ऊर्जा पाने के लिए ब्रह्ममुहूर्त बेहतर समय है। क्योंकि रात की नींद के बाद पिछले दिन की शारीरिक और मानसिक थकान उतर जाने पर दिमाग शांत और स्थिर रहता है। वातावरण और हवा भी स्वच्छ होती है!
*जैविक घड़ी पर आधारित शरीर की दिनचर्या*:--
प्रातः 3 से 5 – इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से फेफड़ों में होती है। थोड़ा गुनगुना पानी पीकर खुली हवा में घूमना एवं प्राणायाम करना । इस समय दीर्घ श्वसन करने से फेफड़ों की कार्यक्षमता खूब विकसित होती है। उन्हें शुद्ध वायु (आक्सीजन) और ऋण आयन विपुल मात्रा में मिलने से शरीर स्वस्थ व स्फूर्तिमान होता है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने वाले लोग बुद्धिमान व उत्साही होते है, और सोते रहने वालों का जीवन निस्तेज हो जाता है ।
प्रातः 5 से 7 – इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से आंत में होती है। प्रातः जागरण से लेकर सुबह 7 बजे के बीच मल-त्याग एवं स्नान का लेना चाहिए । सुबह 7 के बाद जो मल-त्याग करते है उनकी आँतें मल में से त्याज्य द्रवांश का शोषण कर मल को सुखा देती हैं। इससे कब्ज तथा कई अन्य रोग उत्पन्न होते हैं।
प्रातः 7 से 9 – इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से आमाशय में होती है। यह समय भोजन के लिए उपर्युक्त है । इस समय पाचक रस अधिक बनते हैं। भोजन के बीच-बीच में गुनगुना पानी (अनुकूलता अनुसार) घूँट-घूँट पिये।
प्रातः 11 से 1 – इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से हृदय में होती है।
दोपहर 12 बजे के आस–पास मध्याह्न – संध्या (आराम) करने की हमारी संस्कृति में विधान है। इसी लिए भोजन वर्जित है । इस समय तरल पदार्थ ले सकते है। जैसे मट्ठा पी सकते है। दही खा सकते है ।
दोपहर 1 से 3 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से छोटी आंत में होती है। इसका कार्य आहार से मिले पोषक तत्त्वों का अवशोषण व व्यर्थ पदार्थों को बड़ी आँत की ओर धकेलना है। भोजन के बाद प्यास अनुरूप पानी पीना चाहिए । इस समय भोजन करने अथवा सोने से पोषक आहार-रस के शोषण में अवरोध उत्पन्न होता है व शरीर रोगी तथा दुर्बल हो जाता है ।
दोपहर 3 से 5 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से मूत्राशय में होती है । 2-4 घंटे पहले पिये पानी से इस समय मूत्र-त्याग की प्रवृति होती है।
शाम 5 से 7 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से गुर्दे में होती है । इस समय हल्का भोजन कर लेना चाहिए । शाम को सूर्यास्त से 40 मिनट पहले भोजन कर लेना उत्तम रहेगा। सूर्यास्त के 10 मिनट पहले से 10 मिनट बाद तक (संध्याकाल) भोजन न करे। शाम को भोजन के तीन घंटे बाद दूध पी सकते है । देर रात को किया गया भोजन सुस्ती लाता है यह अनुभवगम्य है।
रात्री 7 से 9 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से मस्तिष्क में होती है । इस समय मस्तिष्क विशेष रूप से सक्रिय रहता है । अतः प्रातःकाल के अलावा इस काल में पढ़ा हुआ पाठ जल्दी याद रह जाता है । आधुनिक अन्वेषण से भी इसकी पुष्टी हुई है।
रात्री 9 से 11 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से रीढ़ की हड्डी में स्थित मेरुरज्जु में होती है। इस समय पीठ के बल या बायीं करवट लेकर विश्राम करने से मेरूरज्जु को प्राप्त शक्ति को ग्रहण करने में मदद मिलती है। इस समय की नींद सर्वाधिक विश्रांति प्रदान करती है । इस समय का जागरण शरीर व बुद्धि को थका देता है । यदि इस समय भोजन किया जाय तो वह सुबह तक जठर में पड़ा रहता है, पचता नहीं और उसके सड़ने से हानिकारक द्रव्य पैदा होते हैं जो अम्ल (एसिड) के साथ आँतों में जाने से रोग उत्पन्न करते हैं। इसलिए इस समय भोजन करना खतरनाक है।
रात्री 11 से 1 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से पित्ताशय में होती है । इस समय का जागरण पित्त-विकार, अनिद्रा , नेत्ररोग उत्पन्न करता है व बुढ़ापा जल्दी लाता है । इस समय नई कोशिकाएं बनती है ।
रात्री 1 से 3 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से लीवर में होती है । अन्न का सूक्ष्म पाचन करना यह यकृत का कार्य है। इस समय का जागरण यकृत (लीवर) व पाचन-तंत्र को बिगाड़ देता है । इस समय यदि जागते रहे तो शरीर नींद के वशीभूत होने लगता है, दृष्टि मंद होती है और शरीर की प्रतिक्रियाएं मंद होती हैं। अतः इस समय सड़क दुर्घटनाएँ अधिक होती हैं।
नोट :-ऋषियों व आयुर्वेदाचार्यों ने बिना भूख लगे भोजन करना वर्जित बताया है। अतः प्रातः एवं शाम के भोजन की मात्रा ऐसी रखे, जिससे ऊपर बताए भोजन के समय में खुलकर भूख लगे। जमीन पर कुछ बिछाकर सुखासन में बैठकर ही भोजन करें। इस आसन में मूलाधार चक्र सक्रिय होने से जठराग्नि प्रदीप्त रहती है। कुर्सी पर बैठकर भोजन करने में पाचनशक्ति कमजोर तथा खड़े होकर भोजन करने से तो बिल्कुल नहींवत् हो जाती है। इसलिए ʹबुफे डिनरʹ से बचना चाहिए।
पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का लाभ लेने हेतु सिर पूर्व या दक्षिण दिशा में करके ही सोयें, अन्यथा अनिद्रा जैसी तकलीफें होती हैं।
शरीर की जैविक घड़ी को ठीक ढंग से चलाने हेतु रात्रि को बत्ती बंद करके सोयें। इस संदर्भ में हुए शोध चौंकाने वाले हैं। देर रात तक कार्य या अध्ययन करने से और बत्ती चालू रख के सोने से जैविक घड़ी निष्क्रिय होकर भयंकर स्वास्थ्य-संबंधी हानियाँ होती हैं। अँधेरे में सोने से यह जैविक घड़ी ठीक ढंग से चलती है।
आजकल पाये जाने वाले अधिकांश रोगों का कारण अस्त-व्यस्त दिनचर्या व विपरीत आहार ही है। हम अपनी दिनचर्या शरीर की जैविक घड़ी के अनुरूप बनाये रखें तो शरीर के विभिन्न अंगों की सक्रियता का हमें अनायास ही लाभ मिलेगा। इस प्रकार थोड़ी-सी सजगता हमें स्वस्थ जीवन की प्राप्ति करा देगी।

Wednesday, April 27, 2016

रामयण कोई कहानी नहीं

अमेरिकी वैज्ञानिकों ने किया दावा- सच में थे श्री राम, हनुमान और रावण
कुछ लोग मानते हैं कि रामायण और महाभारत की कथाओं जैसा कुछ नहीं था। वो केवल एक कल्पना थी और कुछ नहीं। पर अब कोई ऐसा नहीं कह पाएगा। क्योंकि अब इसका सबूत मिला है। अमेरिका के वैज्ञानिकों ने उस स्थान को खोज निकाला है जिसका जिक्र रामायण में पाताल लोक के रूप में किया गया है
कहा जाता है कि हनुमानजी ने प्रभु भगवान राम और लक्ष्मण को पातालपुरी के राजा अहिरावण के चंगुल से छुड़ाया था। राम-रावण युद्ध के दौरान अहिरावण ने राम-लक्ष्मण को अगवा कर बंधक बना कर रखा था। भगवान राम व लक्ष्मण को छुड़ाने के लिए बजरंगबली को पातालपुरी के रक्षक मकरध्वज को परास्त करना पड़ा था। मकरध्वज बजरंगबली के ही पुत्र थे, लिहाजा उनका स्वरूप बजरगंबली जैसा ही था।
ये जगह जहां उस काल से जुड़े प्रमाण मिलते हैं वो मध्य अमेरिकी महाद्वीप में पूर्वोत्तर होंडुरास के जंगलों के नीचे दफन है। अमेरिकी वैज्ञानिकों ने लाइडर तकनीकी से इसका 3-डी नक्शा तैयार किया है, जिसमें जमीन की गहराइयों में गदा जैसा हथियार लिए वानर देवता की मूर्ति होने की पुष्टि हुई है।
होंडुरास के जंगल की खुदाई पर प्रतिबंध के कारण इसकी ठीकठाक स्थिति का पता लगाना मुश्किल है। लेकिन इस की पुख्ता जानकारी के लिए होंडुरास सरकार ने आदेश जारी किये हैं। अमेरिकी इतिहासकार भी मानते हैं कि पूर्वोत्तर होंडुरास के घने जंगलों के बीच मस्कीटिया नाम के इलाके में हजारों साल पहले एक गुप्त शहर सियूदाद ब्लांका का वजूद था। वहां के लोग एक विशालकाय वानर मूर्ति की पूजा करते थे।
स्कूल ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज के निदेशक और वैदिक विज्ञान केन्द्र के प्रभारी प्रो. भरत राज सिंह ने बताया है कि पहले विश्व युद्ध के बाद एक अमेरिकी पायलट ने होंडुरास के जंगलों में कुछ अवशेष देखे थे। अमेरिकी पत्रिका 'डेली टाइम्स गज़ट' के मुताबिक इस शहर की पहली जानकारी अमेरिकी खोजकर्ता थिंयोडोर मोर्ड ने 1940 में दी थी। एक अमेरिकी पत्रिका में उसने उस प्राचीन शहर में वानर देवता की पूजा होने की बात भी लिखी थी, लेकिन उसने जगह का खुलासा नहीं किया था। बाद में रहस्यमय तरीके से थियोडोर की मौत हो गई और जगह का रहस्य बरकरार रहा।
करीब 70 साल बाद अमेरिका की ह्यूस्टन यूनिवर्सिटी व नेशनल सेंटर फार एयरबोर्न लेजर मैपिंग के वैज्ञानिकों ने होंडुरास के घने जंगलों में मस्कीटिया नामक स्थान पर लाइडर नामक तकनीक से जमीन के नीचे 3-डी मैपिंग की, जिसमें प्राचीन शहर का पता चला। इसमें जंगल के ऊपर से विमान से अरबों लेजर तरंगें जमीन पर फेंकी गईं। इससे 3-डी डिजिटल नक्शा तैयार हो गया। 3-डी नक्शे में जमीन के नीचे गहराइयों में मानव निर्मित कई वस्तुएं दिखाई दीं। इसमें हाथ में गदा जैसा हथियार लिए घुटनों के बल बैठी हुई है वानर मूर्ति भी दिखी है। अहिरावण के वध के बाद भगवान राम ने मकरध्वज को ही पातालपुरी का राजा बना दिया था।

Tuesday, April 26, 2016

क़ुतुब मीनार का सच

क़ुतुब मीनार का सच,किसने बनवाई ,कब बनवाई
दिल्ली में स्थित क़ुतुब मीनार का नाम तो आप सुना ही होगा।
जिस के बारे कहा जाता हे कुतुबद्दीन ने 1206से 1210 की बीच क़ुतुब मीनार का निर्माण कराया जिस के नाम से क़ुतुब मीनार (क़ुवतुलु इस्लाम मस्जित)पड़ा जिस की उचाई 234 फुट है।
लेकिन आप पता ना हो क़ुतुब मीनार का असली नाम विष्णु स्तंभ,धुव स्तंभ है। जिसका निर्माण वराहमिहिर के मार्गदर्शन में, सम्राट विक्रमादित्य के शासन काल में1600 बर्ष पूर्व खगोलशास्त्र का अध्ययन के लिए बनबाया गया
1191 के अंत में मोहम्मद गौरी ने दिल्ली पर आक्रमण किया,तो पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को पराजित कर दिया,गोरी 1192में दोबारा आक्रमण कर के प्रथ्विराज को हरा दिया,तब कुतुबुद्दीन गोरी का सेनापति था.
1206 में मोहम्मद गोरी ने क़ुतुबुद्दीन को अपना नायाब नियुक्त किया और 1206 के अंत में गौरी की मृत्यु के वाद कुतुबुद्दीन ने गद्दी संभाली, और तमाम विरोधियों को ख़तम करने में उसको लाहोर में दो साल से जाधा का समय लग गया। और 1210 में उस की मृत्यु लाहोर में उस की मृत्यु पोलो खेलते समय घोड़े से गिर कर हुई।
कहा जाता है क़ुतुब मीनार को ,कुवैतूल इस्लाम मस्जित और अजमेर में अढ़ाई दिन का झोपड़ा नामक मस्जित उसी ने वनवाई थी।
अब ध्यान देने बाली बात ये है,कुतुबुद्दीन ने 1206 से ले कर 1210 तक मात्र 4 बर्ष राज्य किया जिसमे दो साल उसको विरोधियो को ख़तम कर में लग गए। तो उस ने क़ुतुब मीनार का निर्माण कब करा दिया?
कुछ जगह ये भी लिखा हे कि क़ुतुब मीनार का निर्माण 1193 के अंत में शुरू हुआ, उस के बाद कुतुबुद्दीन ने मात्र एक मंजिल बनबाई उसके ऊपर की तीन मंजिल उसके परवर्ती बादशाह इल्तुतमिश ने बनबाई और उर उसके ऊपर की शेष मंजिले बाद में बानी,
इस बात पर ध्यान दो अगर 1193 में कुतुबुद्दीन ने मीनार बनवाना शुरुर किया होगा तो उसका नाम बादशाह गोरी के नाम पर क्यों नहीं रखा, कोई बादशाह अपने सेनापति के नाम पर किसी इमारत का नाम क्यों रखने लगा।
उस ने लिखवाया की उस ने स्थान पर बने 27 मंदिरो को तोड़ कर उस के मलबे से मीनार बनवाई गयी, तो क्या किसी ईमारत एक तरह से मलबे से बनाया जा सकता है? जब की गिराई गये भवन का हर पत्थर स्थाननुसार अलग अलग नाप का पूर्व निर्धारित होता है।देने क लिए यह मीनार बानी तो क्या इतनी उचाई से अबाज निचे सुनाई दे सकती है?
क्यों तब लाउड स्पीकर नहीं थे।
अब हम आप को बताते हे सच क्या हे। जहाँ क़ुतुब मीनार परिसर हे वह महरोली कहा जाता है,महरोली वराहमिहिर के नाम पर बसाया गया था जो की सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक और खगोलशास्त्री थे, उन्हों ने उस स्थान को के चारो ओर नक्षत्रो के अध्यकन के लिए 27 कलापूर्ण परिपार्थि का निर्माण करवाया था।
मीनार के स्तंभों पर बहुत ही वारीक कारीगरी के साथ देवी देवताओ के चित्र भी उकेररे गये थी,जिन्हें नष्ट करवाये जाने पर भी कही कही देखने को आज भी मील जातेँ है।कुछ संस्कृत भाषा के अंश भी स्तम्भ और दीवारो पर आज भी देखे और पड़े जा सक्ते है। जो निर्माण के समय पर ही उकेरे गए लगते है। मीनार की सात मंजिले थी सबसे ऊपर की मंजिल पर ब्रमा जी की हाथ में वेद लिए हुए मूर्ति थी,जिसे तोड़ दिया गया.उससे निचे की मंजिल पर विष्णु जी के साथ कुछ और भी मूर्तियां थी, वह भी हटा दिए होगें,
और अब पांच मंजिले ही शेष है।
हम ने आप को पहले ही बता दिया इस नाम विष्णु ध्वज , विष्णु स्तम्भ ,ध्रुव स्तम्भ से चर्चित था। परिसर में खड़ा लौह स्तम्भ सबसे बड़ा प्रमाण है जिस पर लिखा हुआ ब्राम्ही भाषा का लिखा, जिस में लिखा है की यह स्तम्भ जो गरुड़ ध्वज कहा गया है वो सम्राट चंद्रगुप्त बिक्रमदित्य के राज्य काल में 380-414 ईसवी स्थापित किया गया था।
लौह स्तम्भ की कुछ खास बातें यह स्तम्भ 7 मीटर ऊँचा और लगभग 6 तन बजन का है,इस लौह स्तम्भ की खास बात ये है की इसमे आज तक जंग नहीं लगा हैं।इस पर लिखे संसकृत में अंकित कुछ वाक्य कहते है,की इसे चन्द्रगुप्त ने भगवान विष्णु के लिये समर्पित कर दिया था। साथ ही संसकृत में लिखी पंक्तिया स्पष्ट रूप यह बताती हे की बाह्लीक युद्ध के पश्चात् उन्होंने यह स्तम्भ वनवाय। उन के काल में या स्तम्भ समय बताने का काम करता था।
तो आप समज ही गए होगें की इस का सारा सारा श्रेय सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के राज्य काल में खगोलशास्त्री वराहमिहिर को जाता है। न की कुतुबुद्दीन को उस ने मात्र इतना किया भगवान विष्णु की के मंदिर को तोड़ दिया और उस का नाम कूतूब मीनार(कुवातुल इस्लाम मस्जित ) रख दिया, स्तम्भ से हिन्दू संकेतो को छुपा के उन पर अरबीभासा में लिखवा दिया और खुद को श्रेय दिया ।।।
हमारे एक मित्र ने पोस्ट की थी हमने वहाँ से काॅपी कि ताकि सच्चाई सब को पता चले आप भी सेयर जरूर करें ॥