क़ुतुब मीनार का सच,किसने बनवाई ,कब बनवाई
दिल्ली में स्थित क़ुतुब मीनार का नाम तो आप सुना ही होगा।
दिल्ली में स्थित क़ुतुब मीनार का नाम तो आप सुना ही होगा।
जिस के बारे कहा जाता हे कुतुबद्दीन ने 1206से 1210 की बीच क़ुतुब मीनार का निर्माण कराया जिस के नाम से क़ुतुब मीनार (क़ुवतुलु इस्लाम मस्जित)पड़ा जिस की उचाई 234 फुट है।
लेकिन आप पता ना हो क़ुतुब मीनार का असली नाम विष्णु स्तंभ,धुव स्तंभ है। जिसका निर्माण वराहमिहिर के मार्गदर्शन में, सम्राट विक्रमादित्य के शासन काल में1600 बर्ष पूर्व खगोलशास्त्र का अध्ययन के लिए बनबाया गया
1191 के अंत में मोहम्मद गौरी ने दिल्ली पर आक्रमण किया,तो पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को पराजित कर दिया,गोरी 1192में दोबारा आक्रमण कर के प्रथ्विराज को हरा दिया,तब कुतुबुद्दीन गोरी का सेनापति था.
1191 के अंत में मोहम्मद गौरी ने दिल्ली पर आक्रमण किया,तो पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को पराजित कर दिया,गोरी 1192में दोबारा आक्रमण कर के प्रथ्विराज को हरा दिया,तब कुतुबुद्दीन गोरी का सेनापति था.
1206 में मोहम्मद गोरी ने क़ुतुबुद्दीन को अपना नायाब नियुक्त किया और 1206 के अंत में गौरी की मृत्यु के वाद कुतुबुद्दीन ने गद्दी संभाली, और तमाम विरोधियों को ख़तम करने में उसको लाहोर में दो साल से जाधा का समय लग गया। और 1210 में उस की मृत्यु लाहोर में उस की मृत्यु पोलो खेलते समय घोड़े से गिर कर हुई।
कहा जाता है क़ुतुब मीनार को ,कुवैतूल इस्लाम मस्जित और अजमेर में अढ़ाई दिन का झोपड़ा नामक मस्जित उसी ने वनवाई थी।
अब ध्यान देने बाली बात ये है,कुतुबुद्दीन ने 1206 से ले कर 1210 तक मात्र 4 बर्ष राज्य किया जिसमे दो साल उसको विरोधियो को ख़तम कर में लग गए। तो उस ने क़ुतुब मीनार का निर्माण कब करा दिया?
कुछ जगह ये भी लिखा हे कि क़ुतुब मीनार का निर्माण 1193 के अंत में शुरू हुआ, उस के बाद कुतुबुद्दीन ने मात्र एक मंजिल बनबाई उसके ऊपर की तीन मंजिल उसके परवर्ती बादशाह इल्तुतमिश ने बनबाई और उर उसके ऊपर की शेष मंजिले बाद में बानी,
इस बात पर ध्यान दो अगर 1193 में कुतुबुद्दीन ने मीनार बनवाना शुरुर किया होगा तो उसका नाम बादशाह गोरी के नाम पर क्यों नहीं रखा, कोई बादशाह अपने सेनापति के नाम पर किसी इमारत का नाम क्यों रखने लगा।
उस ने लिखवाया की उस ने स्थान पर बने 27 मंदिरो को तोड़ कर उस के मलबे से मीनार बनवाई गयी, तो क्या किसी ईमारत एक तरह से मलबे से बनाया जा सकता है? जब की गिराई गये भवन का हर पत्थर स्थाननुसार अलग अलग नाप का पूर्व निर्धारित होता है।देने क लिए यह मीनार बानी तो क्या इतनी उचाई से अबाज निचे सुनाई दे सकती है?
क्यों तब लाउड स्पीकर नहीं थे।
इस बात पर ध्यान दो अगर 1193 में कुतुबुद्दीन ने मीनार बनवाना शुरुर किया होगा तो उसका नाम बादशाह गोरी के नाम पर क्यों नहीं रखा, कोई बादशाह अपने सेनापति के नाम पर किसी इमारत का नाम क्यों रखने लगा।
उस ने लिखवाया की उस ने स्थान पर बने 27 मंदिरो को तोड़ कर उस के मलबे से मीनार बनवाई गयी, तो क्या किसी ईमारत एक तरह से मलबे से बनाया जा सकता है? जब की गिराई गये भवन का हर पत्थर स्थाननुसार अलग अलग नाप का पूर्व निर्धारित होता है।देने क लिए यह मीनार बानी तो क्या इतनी उचाई से अबाज निचे सुनाई दे सकती है?
क्यों तब लाउड स्पीकर नहीं थे।
अब हम आप को बताते हे सच क्या हे। जहाँ क़ुतुब मीनार परिसर हे वह महरोली कहा जाता है,महरोली वराहमिहिर के नाम पर बसाया गया था जो की सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक और खगोलशास्त्री थे, उन्हों ने उस स्थान को के चारो ओर नक्षत्रो के अध्यकन के लिए 27 कलापूर्ण परिपार्थि का निर्माण करवाया था।
मीनार के स्तंभों पर बहुत ही वारीक कारीगरी के साथ देवी देवताओ के चित्र भी उकेररे गये थी,जिन्हें नष्ट करवाये जाने पर भी कही कही देखने को आज भी मील जातेँ है।कुछ संस्कृत भाषा के अंश भी स्तम्भ और दीवारो पर आज भी देखे और पड़े जा सक्ते है। जो निर्माण के समय पर ही उकेरे गए लगते है। मीनार की सात मंजिले थी सबसे ऊपर की मंजिल पर ब्रमा जी की हाथ में वेद लिए हुए मूर्ति थी,जिसे तोड़ दिया गया.उससे निचे की मंजिल पर विष्णु जी के साथ कुछ और भी मूर्तियां थी, वह भी हटा दिए होगें,
और अब पांच मंजिले ही शेष है।
और अब पांच मंजिले ही शेष है।
हम ने आप को पहले ही बता दिया इस नाम विष्णु ध्वज , विष्णु स्तम्भ ,ध्रुव स्तम्भ से चर्चित था। परिसर में खड़ा लौह स्तम्भ सबसे बड़ा प्रमाण है जिस पर लिखा हुआ ब्राम्ही भाषा का लिखा, जिस में लिखा है की यह स्तम्भ जो गरुड़ ध्वज कहा गया है वो सम्राट चंद्रगुप्त बिक्रमदित्य के राज्य काल में 380-414 ईसवी स्थापित किया गया था।
लौह स्तम्भ की कुछ खास बातें यह स्तम्भ 7 मीटर ऊँचा और लगभग 6 तन बजन का है,इस लौह स्तम्भ की खास बात ये है की इसमे आज तक जंग नहीं लगा हैं।इस पर लिखे संसकृत में अंकित कुछ वाक्य कहते है,की इसे चन्द्रगुप्त ने भगवान विष्णु के लिये समर्पित कर दिया था। साथ ही संसकृत में लिखी पंक्तिया स्पष्ट रूप यह बताती हे की बाह्लीक युद्ध के पश्चात् उन्होंने यह स्तम्भ वनवाय। उन के काल में या स्तम्भ समय बताने का काम करता था।
तो आप समज ही गए होगें की इस का सारा सारा श्रेय सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के राज्य काल में खगोलशास्त्री वराहमिहिर को जाता है। न की कुतुबुद्दीन को उस ने मात्र इतना किया भगवान विष्णु की के मंदिर को तोड़ दिया और उस का नाम कूतूब मीनार(कुवातुल इस्लाम मस्जित ) रख दिया, स्तम्भ से हिन्दू संकेतो को छुपा के उन पर अरबीभासा में लिखवा दिया और खुद को श्रेय दिया ।।।
हमारे एक मित्र ने पोस्ट की थी हमने वहाँ से काॅपी कि ताकि सच्चाई सब को पता चले आप भी सेयर जरूर करें ॥