Saturday, March 10, 2018

दूध घास (दुब) के फायदे

‘दूब’ घास के फायदे जान रह जाएंगे दंग, आंखों से लेकर पेट की समस्याओं में है रामबाण

 

‘दूब’ घास का प्रयोग हिन्दू संस्कारों और कर्मकांडों में किया जाता है ये तो हम सब जानते हैं पर हम से बहुत लोग ये नहीं जानते हैं कि इसका इस्तेमाल सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद होता है। जी हां, पूजन के दौरान भगवान गणेश को अर्पित की जाने वाली कोमल दूब वास्तव में एक आयुर्वेदिक औषधि होती है। औषधीय गुणों से भरपूर दूब का उपयोग यौन रोगों के साथ लीवर और पेट की समस्याओं में रामबाण माना जाता है। पतंजलि आयुर्वेद हरिद्वार के आचार्य बाल कृष्ण के अनुसार सदियों से आयुर्वेद में दूब का उपयोग अनेक असाध्य रोगों के उपचार के लिए किया जा रहा है.. आज हम आपको दूब के इस्तेमाल से होने वाले ऐसे कुछ चमत्कारी लाभों के बारे में बताने जा रहे हैं।

आयुर्वेद के अनुसार दूब में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, कैल्शियम, पोटाशियम जैसे पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं जो कि पित्त और कब्ज जैसे विकारों को दूर करते हैं .. ऐसे में इसका सेवन पेट की समस्याओं, यौन रोगों और लीवर के रोगों में लाभदायी होता है।

पथरी का इलाज

दूब को लगभग 30 मिली पानी में पीसकर उसमें मिश्री मिलाकर सुबह-शाम पीने से पथरी में शीघ्र ही लाभ होता है।

गुदा रोग में लाभकारी है दूब

गुदा रोग में दूब बेहद लाभकारी साबित होता है। दूर्वा को पीसकर बवासीर पर लेप करने से लाभ होता है.. साथ ही घृत को दूब स्वरस में भली-भांति मिलाकर अर्श के अंकुरों पर लेप करें इससे रक्तस्त्राव शीघ्र रुक जाएगा।

सिर और आंखो के लिए है फायदेमंद

आयुर्वेद के विद्वानों के अनुसार दूब और चूने को बराबर मात्रा में पानी के साथ पीसकर माथे पर लेप करने से सिरदर्द में तुंरत लाभ होता है। वहीं अगर दूब को पीसकर पलकों पर लगाया जाए तो इससे आंखो को फायदा पहुंचता है और नेत्र सम्बंधी रोग दूर होते हैं ।

नकसीर में आराम

अगर किसी को नकसीर की परेशानी रहती है तो अनार पुष्प स्वरस को दूब के रस के साथ के साथ मिलाकर उसकी 1 से 2 बूंद नाक में डालने से नकसीर में काफी आराम मिलता है और नाक से खून आना तुंरत बंद हो जाता है।

मुंह के छालों का इलाज

आयुर्वेद गुरू बालकृष्ण के अनुसार दूर्वा क्वाथ से कुल्ले करने से मुंह के छालों में लाभ होता है।

उदर रोगों में लाभदायक

आयुर्वेद के जानकारों के अनुसार दूब का ताजा रस पुराने अतिसार और पतले अतिसारों में बेहद उपयोगी होता है। इसके लिए दूब को सोंठ और सौंफ के साथ उबालकर पीने से आराम मिलता है।

मूत्ररोग का उपचार

दूब के रस को मिश्री के साथ मिलाकर पीने से पेशाब के साथ खून आना बंद हो जाता है.. साथ ही 1 से 2 ग्राम दूर्वा को दुध में पीस छानकर पीने से मूत्रदाह मिटती है।

रक्तप्रदर और गर्भपात में लाभदायी

दूब का प्रयोग रक्तप्रदर और गर्भपात में भी उपयोगी है.. दूब के रस में सफेद चंदन और मिश्री मिलाकर पीने से रक्तप्रदर में शीघ्र लाभ मिलता है। इसके साथ ही प्रदर रोग, रक्तस्त्राव और गर्भपात जैसी योनि की समस्याओं में इसके सेवन करने से आराम मिलता है और रक्त बहना तुरंत रूक जाता है.. साथ ही दूब के सेवन से गर्भाशय को शक्ति और पोषण मिलती है।

Friday, March 9, 2018

महिलाओं के सम्पूर्ण स्वास्थ्य के लिये

महिलाओं के सम्पूर्ण स्वास्थ्य के लिए एक बहुत आसान  और उपयोगी प्रयोग

आजकल के मौसम में पलाश के फूल आसानी से मिल जाते हैं इसको ढाक भी कहते हैं इसका जो गोंद होता है उसको कमर कस कहते हैं लाल रंग वाले पलाश ( butea monosperma ) के फूल एकत्र कर लें और छाया में सुखा लें और पाउडर बनाकर कांच के बर्तन में रख लें .. 

उपयोग कैसे करें  – भोजन के एक घंटे बाद 5 ग्राम पाउडर को एक गिलास दूध में घोल कर इसमें आधा धागे वाली मिश्री का पाउडर मिला दें और पंद्रह मिनट रखा रहने दें फिर पी लें ..ऐसा दिन में दो बार सुबह शाम करे..... बस इतना ही करना है....... मान लीजिए किसी को फूल ना मिले तो इसकी कोपले तोड़कर छाया में सुखा लें और चूर्ण करके बराबर मिश्री मिलाकर पानी के साथ प्रयोग करें.

जितना सरल यह प्रयोग है उससे कई गुना ज्यादा इसके फायदे है... महिलाओं के गर्भाशय की कोई भी समस्या हो bulky uterus हो, bleeding ज्यादा हो रसौली cyst हो PCOS हो सबमे फायदा करती है, रसौली के कारण गर्भ ना रुकता हो तो इसका प्रयोग करें
झाइयाँ, कील मुहासे हों, चेहरा कांतिहीन हो गया हो, यह ठीक करता है, अपनी उम्र से ज्यादा दिखने लगी हो, स्तन बेडौल ढीले, पूरा शरीर लटका हुआ हो तो कसावट आती है... अधिक समय तक तक जवान बने रहने की चाहत हो तो यह बहुत उपयोगी है

शरीर में अधिक गर्मी का महसूस करना हाथ पैरो की जलन कुछ ही दिनों में हमेशा के लिए ख़त्म हो जाती है

सावधानी ---  जिन्हें मधुमेह  हो  वो  दूध और मिश्री का प्रयोग करने के बजाय 15 ग्राम पाउडर 250 ml गुनगुने पानी में रात को  भिगो दें और सुबह  मसल कर छान लें दो खुराक बनाये और भोजन के एक घंटे बाद दिन में दो बार पिए ..ऊपर बताये लाभ तो होंगे ही ..सुगर लेवल भी नियंत्रित रहेगा .....

पीरियडस के दो तीन दिन पहले इसको बंद कर देना चाहिए

Thursday, March 8, 2018

जया एकादशी

🌷 *जया एकादशी* 🌷

➡ *27 जनवरी 2018 शनिवार को सुबह 11:15 से 28 जनवरी 2018 रविवार को सुबह 08:27 तक एकादशी है ।*
💥 *विशेष - 28 जनवरी 2018 रविवार को एकादशी का व्रत (उपवास) रखें ।*

🙏🏻 *युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा : भगवन् ! कृपा करके यह बताइये कि माघ मास के शुक्लपक्ष में कौन सी एकादशी होती है, उसकी विधि क्या है तथा उसमें किस देवता का पूजन किया जाता है ?*

🙏🏻 *भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजेन्द्र ! माघ मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी होती है, उसका नाम ‘जया’ है । वह सब पापों को हरनेवाली उत्तम तिथि है । पवित्र होने के साथ ही पापों का नाश करनेवाली तथा मनुष्यों को भाग और मोक्ष प्रदान करनेवाली है । इतना ही नहीं , वह ब्रह्महत्या जैसे पाप तथा पिशाचत्व का भी विनाश करनेवाली है । इसका व्रत करने पर मनुष्यों को कभी प्रेतयोनि में नहीं जाना पड़ता । इसलिए राजन् ! प्रयत्नपूर्वक ‘जया’ नाम की एकादशी का व्रत करना चाहिए ।*

🙏🏻 *एक समय की बात है । स्वर्गलोक में देवराज इन्द्र राज्य करते थे । देवगण पारिजात वृक्षों से युक्त नंदनवन में अप्सराओं के साथ विहार कर रहे थे । पचास करोड़ गन्धर्वों के नायक देवराज इन्द्र ने स्वेच्छानुसार वन में विहार करते हुए बड़े हर्ष के साथ नृत्य का आयोजन किया । गन्धर्व उसमें गान कर रहे थे, जिनमें पुष्पदन्त, चित्रसेन तथा उसका पुत्र - ये तीन प्रधान थे । चित्रसेन की स्त्री का नाम मालिनी था । मालिनी से एक कन्या उत्पन्न हुई थी, जो पुष्पवन्ती के नाम से विख्यात थी । पुष्पदन्त गन्धर्व का एक पुत्र था, जिसको लोग माल्यवान कहते थे । माल्यवान पुष्पवन्ती के रुप पर अत्यन्त मोहित था । ये दोनों भी इन्द्र के संतोषार्थ नृत्य करने के लिए आये थे । इन दोनों का गान हो रहा था । इनके साथ अप्सराएँ भी थीं । परस्पर अनुराग के कारण ये दोनों मोह के वशीभूत हो गये । चित्त में भ्रान्ति आ गयी इसलिए वे शुद्ध गान न गा सके । कभी ताल भंग हो जाता था तो कभी गीत बंद हो जाता था । इन्द्र ने इस प्रमाद पर विचार किया और इसे अपना अपमान समझकर वे कुपित हो गये ।*

🙏🏻  *अत: इन दोनों को शाप देते हुए बोले : ‘ओ मूर्खो ! तुम दोनों को धिक्कार है ! तुम लोग पतित और मेरी आज्ञाभंग करनेवाले हो, अत: पति पत्नी के रुप में रहते हुए पिशाच हो जाओ ।’*

🙏🏻 *इन्द्र के इस प्रकार शाप देने पर इन दोनों के मन में बड़ा दु:ख हुआ । वे हिमालय पर्वत पर चले गये और पिशाचयोनि को पाकर भयंकर दु:ख भोगने लगे । शारीरिक पातक से उत्पन्न ताप से पीड़ित होकर दोनों ही पर्वत की कन्दराओं में विचरते रहते थे । एक दिन पिशाच ने अपनी पत्नी पिशाची से कहा : ‘हमने कौन सा पाप किया है, जिससे यह पिशाचयोनि प्राप्त हुई है ? नरक का कष्ट अत्यन्त भयंकर है तथा पिशाचयोनि भी बहुत दु:ख देनेवाली है । अत: पूर्ण प्रयत्न करके पाप से बचना चाहिए ।’*

🙏🏻 *इस प्रकार चिन्तामग्न होकर वे दोनों दु:ख के कारण सूखते जा रहे थे । दैवयोग से उन्हें माघ मास के शुक्लपक्ष की एकादशी की तिथि प्राप्त हो गयी । ‘जया’ नाम से विख्यात वह तिथि सब तिथियों में उत्तम है । उस दिन उन दोनों ने सब प्रकार के आहार त्याग दिये, जल पान तक नहीं किया । किसी जीव की हिंसा नहीं की, यहाँ तक कि खाने के लिए फल तक नहीं काटा । निरन्तर दु:ख से युक्त होकर वे एक पीपल के समीप बैठे रहे । सूर्यास्त हो गया । उनके प्राण हर लेने वाली भयंकर रात्रि उपस्थित हुई । उन्हें नींद नहीं आयी । वे रति या और कोई सुख भी नहीं पा सके ।*

🙏🏻 *सूर्यादय हुआ, द्वादशी का दिन आया । इस प्रकार उस पिशाच दंपति के द्वारा ‘जया’ के उत्तम व्रत का पालन हो गया । उन्होंने रात में जागरण भी किया था । उस व्रत के प्रभाव से तथा भगवान विष्णु की शक्ति से उन दोनों का पिशाचत्व दूर हो गया । पुष्पवन्ती और माल्यवान अपने पूर्वरुप में आ गये । उनके हृदय में वही पुराना स्नेह उमड़ रहा था । उनके शरीर पर पहले जैसे ही अलंकार शोभा पा रहे थे ।*

🙏🏻 *वे दोनों मनोहर रुप धारण करके विमान पर बैठे और स्वर्गलोक में चले गये । वहाँ देवराज इन्द्र के सामने जाकर दोनों ने बड़ी प्रसन्नता के साथ उन्हें प्रणाम किया ।*

🙏🏻 *उन्हें इस रुप में उपस्थित देखकर इन्द्र को बड़ा विस्मय हुआ ! उन्होंने पूछा: ‘बताओ, किस पुण्य के प्रभाव से तुम दोनों का पिशाचत्व दूर हुआ है? तुम मेरे शाप को प्राप्त हो चुके थे, फिर किस देवता ने तुम्हें उससे छुटकारा दिलाया है?’*

🙏🏻 *माल्यवान बोला : स्वामिन् ! भगवान वासुदेव की कृपा तथा ‘जया’ नामक एकादशी के व्रत से हमारा पिशाचत्व दूर हुआ है ।*

🙏🏻 *इन्द्र ने कहा : … तो अब तुम दोनों मेरे कहने से सुधापान करो । जो लोग एकादशी के व्रत में तत्पर और भगवान श्रीकृष्ण के शरणागत होते हैं, वे हमारे भी पूजनीय होते हैं ।*

🙏🏻 *भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं : राजन् ! इस कारण एकादशी का व्रत करना चाहिए । नृपश्रेष्ठ ! ‘जया’ ब्रह्महत्या का पाप भी दूर करनेवाली है । जिसने ‘जया’ का व्रत किया है, उसने सब प्रकार के दान दे दिये और सम्पूर्ण यज्ञों का अनुष्ठान कर लिया । इस माहात्म्य के पढ़ने और सुनने से अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है ।*
         

Thursday, February 1, 2018

नाभि में छुपा सेहत राज

गणेश चतुर्थी

राशि के लिये मंत्र

|| मूल मन्त्र ||

कुछ लोग अपनी राशि के अनुसार भी मंत्र का जाप करते हैं. राशि के अनुसार मंत्र जाप यदि आप करना चाह्ते हैं तो मंत्र इस प्रकार हैं :

मेष : ऊँ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीनारायण नम:

वृषभ : ऊँ गौपालायै उत्तर ध्वजाय नम:

मिथुन : ऊँ क्लीं कृष्णायै नम:

कर्क : ऊँ हिरण्यगर्भायै अव्यक्त रूपिणे नम:

सिंह : ऊँ क्लीं ब्रह्मणे जगदाधारायै नम:

कन्या : ऊँ नमो प्रीं पीताम्बरायै नम:

तुला : ऊँ तत्व निरंजनाय तारक रामायै नम:

वृश्चिक : ऊँ नारायणाय सुरसिंहायै नम:

धनु : ऊँ श्रीं देवकीकृष्णाय ऊर्ध्वषंतायै नम:

मकर : ऊँ श्रीं वत्सलायै नम:

कुंभ : श्रीं उपेन्द्रायै अच्युताय नम:

मीन : ऊँ क्लीं उद्‍धृताय उद्धारिणे नम:
|| ॐ श्री विघ्नेश्वराय नमः ||

Saturday, November 25, 2017

सूर्य को जल देने के लाभ

सूर्य नव ग्रहो के स्वामी हैं। ये पंचदेवों में एक हैं।
जीवन को व्यवस्था सूर्य से ही
मिलती है। पुराणों में सूर्य की उपासना को
सभी रोगों को दूर करने वाला बताया गया है।
हिंदू संस्कृति में अर्घ्य दान यानी जल देना सामने वाले
के प्रति श्रद्धा और आस्था दिखाने का प्रतीक है।
लिहाजा स्नान के बाद सूर्य को अर्घ्य देने का अर्थ है
जीवन में संतुलन को आमांत्रित करना।अघर्य देते समय
सूर्य के नामों का उच्चारण करने का विघान है।
शास्त्रों के मुताबिक प्रातःकाल पूर्व दिशा की ओर मुख
करके और शाम के वक्त पश्चिम की ओर मुख करके
सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए। मान्यता है कि सूर्य को अर्घ्य देते
समय गिरने वाले जलकण वज्र बनकर रोग रूपी राक्षसों
का विनाश करते हैं।
जल चिकित्सा और आयुर्वेद के अनुसार प्रातःकालीन
सूर्य को सिर के ऊपर पानी का बर्तन ले जाकर जल
अर्पित करना चाहिए। ऐसा करते समय अपनी दृष्टि
जलधारा के बीच में रखें ताकि जल से छनकर सूर्य
की किरणें दोनों आंखों के मध्य में पड़ें। इससे आंखों
की रौशनी और बौद्धिक क्षमता
बढ़ती है।
जल से छनकर जब सूर्य की किरणें शरीर
पर पड़ती हैं तो शरीर में ऊर्जा का संचार
होता है। इससे शरीर में रोग से लड़ने की
शक्ति बढ़ती है साथ ही आस-पास
सकारात्मक उर्जा का संचार होता है जो जीवन में आगे
बढ़ने की प्रेरणा देता है।
ज्योतिषशास्त्र में कहा जाता है कि कुण्डली में सूर्य
कमज़ोर स्थिति में होने पर उगते सूर्य को जल देना चाहिए। सूर्य के
मजबूत होने से शरीर स्वस्थ और उर्जावान रहता है।
इससे सफलता के रास्ते में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं।