Sunday, May 7, 2017

डेंगू बुखार के घरेलू उपाय

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*डेंगू बुखार के सफल घरेलु उपचार लक्षण व बचाव | Home Remedies For Dengue*

डेंगू होने पर बुखार आता है, शरीर में प्लेटलेट्स कम हो होने लगते है और खून की कमी होने लगती है। दुनिया भर में हर साल डेंगू के कारण हज़ारो लाखों लोग अपनी जान गंवा देते है, ये बीमारी एडीज नामक मच्छर के काटने की वजह से होती है। इस प्रजाति के मच्छर जादातर दिन मे काटते है और ये मच्छर साफ़ पानी में फैलते है। ड्रम, टंकी और कूलर में पड़े पानी में ये मच्छर अंडे देते है। अक्सर लोग डेंगू होने पर घबरा जाते है, पर इस बीमारी में घबराने की नहीं धैर्य की जरुरत है। इस लेख में डेंगू का इलाज के घरेलु नुस्खे और उपाय के साथ साथ इसके लक्षण और बचाव के बारे में पढ़ेंगे और जानेंगे डेंगू बुखार में क्या करे, natural home remedies for dengue fever treatment in hindi.

एलोपैथी में डेंगू के इलाज की अभी तक कोई दवा नहीं है। डेंगू में बुखार कंट्रोल नहीं होता और रोगी के प्लेटलेट्स घटने लगते है। कई बार लगातार बुखार के रहने और प्लेटलेट्स के घटने से रोगी की मौत भी हो जाती है। इसी वजह से डेंगू को जान लेवा रोग कहा जाता है।
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🔺लक्षण :

डेंगू बुखार होने पर रोगी को अचानक बिना खांसी व जुकाम के तेज बुखार हो जाता है, रोगी के शरीर में तेज दर्द होकर हडि्डयों में पीड़ा होती हैं। रोगी के सिर के अगले हिस्से में तेज दर्द होता है, आंख के पिछले भाग में दर्द होता है, रोगी की मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द होता है, रोगी को भूख कम लगती है और उसके मुंह का स्वाद खराब हो जाता है, रोगी की छाती पर खसरे के जैसे दाने निकल आते हैं, इसके अलावा जी मिचलाना, उल्टी होना, रोशनी से चिड़चिड़ाहट होना आदि लक्षण पाए जाते हैं। परन्तु कभी-कभी डेंगू बुखार में खून भी आने लगता है, जिसे हीमोरैजिक रक्तस्राव कहते हैं। हीमोरैजिक रक्तस्राव के समय के लक्षण कुछ इस प्रकार हैं- लगातार पेट में तेज दर्द रहना, त्वचा ठंड़ी, पीली व चिपचिपी होना, रोगी के चेहरे और हाथ-पैरों पर लाल दाने हो जाते हैं। हीमोरैजिक डेंगू होने पर शरीर के अन्दरूनी अंगों से खून आने लगता है। नाक, मुंह व मल के रास्ते खून आता है जिससे कई बार रोगी बेहोश हो जाता है। खून के बिना या खून के साथ बार-बार उल्टी, नींद के साथ व्याकुलता, लगातार चिल्लाना, अधिक प्यास का लगना या मुंह का बार-बार सूखना आदि लक्षण पैदा हो जाते हैं। हीमोरैजिक डेंगू अधिक खतरनाक होता हैं और डेंगू बुखार साधारण बुखार से काफी मिलता-जुलता होता है।

🔺डेंगू का इलाज के घरेलु उपाय और आयुर्वेदिक नुस्खे :
Dengu ka ilaj ke Gharelu Upay aur Ayurvedic Nuskhe

🔘एलोवेरा, गेंहू का ज्वारा, गिलोय और पपीते के पत्ते। इन सबको मिला कर इन का रस पीने से डेंगू में चमत्कारी ढंग से फायदा मिलता है। ये उपाय चिकनगुनिया का इलाज में भी काफी उपयोगी है। अगर ये सब चीज़े ना मिले तो गिलोय का पानी दिन में 3 बार पिये, इससे भी डेंगू के उपचार में फायदा मिलता है।

🔘गिलोय(giloy)

सुबह शाम घी या फिर या शहद में गिलोय का रस मिला कर पीने से खून की कमी दूर होती है।
🔘तुलसी (Basil)

तुलसी के पत्तों को गरम पानी में उबालकर छानकर, रोगी को पीने को दें। तुलसी की यह चाय डेंगू रोगी को बेहद आराम पहुंचाती है। यह चाय दिनभर में तीन से चार बार ली जा सकती है।
🔘चिरायता (Chirayta)

चिरायता में बुखार को ठीक करने के गुण होते हैं। डेंगू के बुखार को भी चिरायता के इस्तेमाल से ठीक किया जा सकता है।

🔘मेथी के पत्तेः

यह पत्तियां बुखार कम करने के लिए सहायक हैं. यह पीड़ित का दर्द दूर कर उसे आसानी से नींद में मदद करती हैं. इसकी पत्तियों को पानी में भिगोकर उसके पानी को पीया जा सकता है. इसके अलावा, मेथी पाउडर को भी पानी में मिलाकर पी सकते हैं.
विशेष : अच्युताय हरिओम सुरक्षा वटी व अच्युताय हरिओम तुलसी अर्क डेंगू रोग में काफी राहत पहुचाता है | इसे रोगी व निरोगी दोनों अवस्थाओं में लिया जा सकता है |

*🔺प्राप्ति-स्थान : संत श्री आशारामजी आश्रमों और श्री योग वेदांत सेवा समितियों के सेवाकेंद्र |*

🔺डेंगू से आसानी से बचा जा सकता है :
How to Stay Safe from Dengue Fever?

🔘1. घर के अंदर और आस पड़ोस में पानी जमा न होने दें
🔘2. नीम की पत्तियों का धुँआ घर में फैलायें
🔘3. पानी के सभी बर्तन को खुला न रखें
🔘4. किचेन और वाशरूम को सूखा रखें
🔘5. कूलर का पानी सुबह-शाम बदलते रहें
🔘6. खिड़कियों और दरवाज़ों में जाली लगवायें
🔘7. शरीर पर मच्छर को दूर रखने वाली क्रीम लगायें
🔘8. शरीर पूरी तरह से ढकने वाले कपड़े पहनें
🔘9. सोते समय मच्छर दानी का प्रयोग करें
🔘10. घर के आस पास मच्छर मारने वाली दवा का छिड़काव करवायें

डेंगू फैलने की खबर मिलते ही अपनी दिनचर्या और खान-पान बदलें :

🔺Precautions, Habit and Food

डेंगू एक लाइलाज़ रोग है अभी तक इसकी कोई दवा या वैक्सीन नहीं बनी है। सिर्फ़ शरीर की इम्यूनिटी / रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना ही एक मात्र इलाज है। उपरोक्त लक्षण दिखते ही पास के अस्पताल जायें।

डेंगू होने पर शरीर में प्लेटलेट्स की संख्या तेज़ी से घटने लगती है। ऐसे में दवा के साथ-साथ खान-पान और सही दिनचर्या रखना बेहद ज़रूरी हो जाता है।

🔺डेंगू से बचने या होने पर नीचे दी गयी चीज़ों का सेवन करना चाहिए –

🔘1. सादा भोजन खायें जिसमें नमक स्वाद से अधिक न हो। मसालेदार चटपटी चीज़ों का सेवन बंद कर दें।
🔘2. अनार, ज्वार और गेहूँ के घास का रस पियें।
🔘3. ताज़े मौसमी फलों का सेवन करें।
🔘4. नारियल पानी और साफ़ पानी का अधिक से अधिक मात्रा में पियें।
🔘5. विटामिन C युक्त फलों को खाना स्वस्थप्रद रहता है। नींबू, संतरे, मौसम्बी, अंगूर, स्ट्राबरी और जामुन में पर्याप्त मात्रा में वाइटमिन C पाया जाता है।
🔘6. पपीते के पत्तों का रस बनाकर दिन में दो से तीन बार पिएं, यह माना जाता है कि इससे प्लेटलेट्स की संख्या बढ़ती है।
🔘7. पपीते की तरह गिलोय की बेल का सत्व भी शरीर में प्लेटलेट्स की संख्या नियमित रखने में सहायक होता है।

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अंडे की हकीकत

अंडे की वह हकीकत जो आपसे छुपाई गई | You Will Never Eat Eggs Again After Reading This*
मादा स्तनपाईयों (बन्दर बिल्ली गाय मनुष्य) में एक निश्चित समय के बाद अंडोत्सर्जन एक चक्र के रूप में होता है उदारहरणतः मनुष्यों में यह महीने में एक बार,.. चार दिन तक होता है जिसे माहवारी या मासिक धर्म कहते है ..उन दिनों में स्त्रियों को पूजा पाठ चूल्हा रसोईघर आदि से दूर रखा जाता है ..यहाँ तक की स्नान से पहले किसी को छूना भी वर्जित है कई परिवारों में …शास्त्रों में भी इन नियमों का वर्णन है
इसका वैज्ञानिक विश्लेषण करना चाहूँगा ..मासिक स्राव के दौरान स्त्रियों में मादा हार्मोन (estrogen) की अत्यधिक मात्रा उत्सर्जित होती है और सारे शारीर से यह निकलता रहता है ..
इसकी पुष्टि के लिए एक छोटा सा प्रयोग करिये ..एक गमले में फूल या कोई भी पौधा है तो उस पर रजस्वला स्त्री से दो चार दिन तक पानी से सिंचाई कराइये ..वह पौधा सूख जाएगा ,
अब आते है मुर्गी के अण्डे की ओर*
१) पक्षियों (मुर्गियों) में भी अंडोत्सर्जन एक चक्र के रूप में होता है अंतर केवल इतना है की वह तरल रूप में ना हो कर ठोस (अण्डे) के रूप में बाहर आता है ,
२) सीधे तौर पर कहा जाए तो अंडा मुर्गी की माहवारी या मासिक धर्म है और मादा हार्मोन (estrogen) से भरपूर है और बहुत ही हानिकारक है
३) ज्यादा पैसे कमाने के लिए आधुनिक तकनीक का प्रयोग कर आजकल मुर्गियों को भारत में निषेधित ड्रग ओक्सिटोसिन(oxytocin) का इंजेक्शन लगाया जाता है जिससे के मुर्गियाँ लगातार अनिषेचित (unfertilized) अण्डे देती है
४) इन भ्रूणों (अन्डो) को खाने से पुरुषों में (estrogen) हार्मोन के बढ़ने के कारण कई रोग उत्पन्न हो रहे है जैसे के वीर्य में शुक्राणुओ की कमी (oligozoospermia, azoospermia) , नपुंसकता और स्तनों का उगना (gynacomastia), हार्मोन असंतुलन के कारण डिप्रेशन आदि …
वहीँ स्त्रियों में अनियमित मासिक, बन्ध्यत्व , (PCO poly cystic oveary) गर्भाशय कैंसर आदि रोग हो रहे है
५) अन्डो में पोषक पदार्थो के लाभ से ज्यादा इन रोगों से हांनी का पलड़ा ही भारी है .
६) अन्डो के अंदर का पीला भाग लगभग ७० % कोलेस्ट्रोल है जो की ह्रदय रोग (heart attack) का मुख्य कारण है
7) पक्षियों की माहवारी (अन्डो) को खाना धर्म और शास्त्रों के विरुद्ध , अप्राकृतिक , और अपवित्र और चंडाल कर्म है

कपूर का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्त्व

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*कर्पूर का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व | Scientific and spiritual benefits of Camphor (kapur)*
*कर्पूर जलाने से देवदोष व पितृदोष का शमन होता है। कर्पूर अति सुगंधित पदार्थ होता है। इसके दहन से वातावरण सुगंधित हो जाता है।*
*वैज्ञानिक शोधों से यह भी ज्ञात हुआ है कि इसकी सुगंध से जीवाणु, विषाणु आदि बीमारी फैलाने वाले जीव नष्ट हो जाते हैं जिससे वातावरण शुद्ध हो जाता है तथा बीमारी होने का भय भी नहीं रहता।यही कारण है कि पूजन, आरती आदि धार्मिक कर्मकांडों में कर्पूर का विशेष महत्व बताया गया है।*
*भगवान् शिव के गौर-वर्ण की तुलना भी कर्पूर से की गयी है…*
*कर्पूरगौरम करुणावतारम संसारसारं भुजगेंद्रहारम |*
*सदावसंतम हृदयारविन्दे भवम भवानी सहितं नमामि ||*
*कर्पूर के समान चमकीले गौर वर्णवाले ,करुणा के साक्षात् अवतार, इस असार संसार के एकमात्र सार, गले में भुजंग की माला डाले, भगवान शंकर जो माता भवानी के साथ भक्तों के हृदय कमलों में सदा सर्वदा बसे रहते हैं… हम उन देवाधिदेव की वंदना करते हैं…*
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प्याज क्यो काटकर नही रखना चाहिए

*"प्याज "के संबध में महत्वपूर्ण जानकारी -अवश्य पढ़े*
सन 1919 में फ्लू से चार करोड़ लोग मारे जा चुके थे तब एक डॉक्टर कई किसानों से उनके घर इस प्रत्याशा में मिला कि वो कैसे इन किसानों को इस महामारी से लड़ने में सहायता कर सकता है। बहुत सारे किसान इस फ्लू से ग्रसित थे और उनमें से बहुत से मारे जा चुके थे।
डॉक्टर जब इनमें से एक किसान के संपर्क में आया तो उसे ये जान कर बहुत आश्चर्य हुआ जब उसे ये ज्ञात हुआ कि सारे गाँव के फ्लू से ग्रसितहोने के बावजूद ये किसान परिवार बिलकुल  बिलकुल स्वस्थ्य था तब डॉक्टर को ये जानने की इच्छा जाएगी कि ऐसा इस किसान परिवार ने सारे गाँव से हटकर क्या किया कि वो इस भंयकर महामारी में भी स्वस्थ्य थे। तब किसान की पत्नी ने उन्हें बताया कि उसने अपने मकान के दोनों कमरों में एक प्लेट में बिना छिली प्याज रख दी थी तब डॉक्टर ने प्लेट में रखी इन प्याज में से क को माइक्रोस्कोप से देखा तो उसे इस प्याज में उस घातक फ्लू के बैक्टेरिया मिले जो संभवतया इन प्याज द्वारा अवशोषित कर लिए गए थे और शायद यही कारण था कि इतनी बड़ी महामारी में ये परिवार बिलकुल स्वस्थ्य क्योंकि फ्लू के वायरस इन प्याज द्वारा सोख लिए गए थे। 
जब मैंने अपने एक मित्र जो अमेरिका में रहते थे और मुझे हमेशा स्वास्थ्य संबधी मुद्दों पर  बेहद ज्ञानवर्धक जानकारी भेजते रहते हैं तब उन्होंने प्याज के संबध में बेहद महत्वपूर्ण जानकारी/अनुभव मुझे भेजा करते हैं ।  उन्होंने  मुझे  इस कहानी को भेजा। उनकी इस बेहद रोचक कहानी के लिए धन्यवाद। क्योंकि मुझे इस  किसान वाली कहानी के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। जब मैं न्यूमोनिया से ग्रसित था और कहने की आवश्यकता नहीं थी कि मैं बहुत कमज़ोर महसूस कर रहा था तब मैंने एक लेख पढ़ा था जिसमें ये बताया गया था कि प्याज को बीच से काटकर रात में  न्यूमोनिया से ग्रस्त मरीज़ के कमरे में एक जार में रख दिया गया था और सुबह यह देख कर बेहद आश्चर्य हुआ कि प्याज सुबह कीटाणुओं की वज़ह से  बिलकुल काली हो गई थी तब मैंने भी अपने कमरे में वैसे ही किया और देखा अगले दिन प्याज बिलकुल काली होकर खराब हो चुकी थी और मैं काफी स्वस्थ्य महसूस कर रहा था।
कई बार हम पेट की बीमारी से दो चार होते है तब हम इस बात से अनजान रहते है कि इस बीमारी के लिए किसे दोषी ठहराया जाए। तब नि :संदेह प्याज को इस बीमारी के लिए दोषी ठहराया जा सकता है ,प्याज बैक्टेरिया को अवशोषित कर लेती है यही कारण है  कि अपने इस गुण के कारण प्याज हमें ठण्ड और फ्लू से बचाती है अत :वे प्याज बिलकुल नहीं खाना चाहिए जो बहुत देर पहल काटी गई हो और प्लेट में रखी गई हों। ये जान लें कि "काट कर रखी गई प्याज बहुत विषाक्त होती हैं "
जब कभी भी फ़ूड पॉइसनिंग के केस अस्पताल में आते हैं तो सबसे पहले इस बात की जानकारी ली जाती कि मरीज़ ने अंतिम बार प्याज कब खाई थी. और वे प्याज कहाँ से आई थीं ,(खासकर सलाद  में )तब इस बीमारी के लिए या तो प्याज दोषी हैं या काफी देर पहले कटे हुए "आलू "
प्याज बैक्टेरिया के लिए "चुंबक "की तरह काम करती  हैं खासकर कच्ची प्याज। आप कभी भी थोड़ी सी भी  कटी हुई प्याज को देर तक रखने की गलती न करे ये बेहद खतरनाक  हैं यहाँ तक कि किसी बंद थैली में इसे रेफ्रिजरेटर में रखना भी  सुरक्षित नहीं  है। प्याज ज़रा सी काट देने पर ये बैक्टेरिया से ग्रसित हो सकती है औए आपके लिए खतरनाक हो सकती है। यदि आप कटी हुई प्याज को सब्ज़ी बनाने के लिए उपयोग कर रहें हो तब तो ये ठीक है मगर यदि आप कटी हुई प्याज अपनी ब्रेड पर रख कर खा रहें है तो ये बेहद खतरनाक है ऐसी स्थिति में आप मुसीबत को न्योता दे रहें हैं। याद रखे कटी हुई प्याज और कटे हुए आलू की नमी बैक्टेरिया को तेज़ी से  पनपने में बेहद सहायक होता है। कुत्तों  को  कभी भी प्याज नहीं खिलाना चाहिए  क्योंकि प्याज को  उनका पेट का मेटाबोलिज़ कभी भी   नहीं पचाता।
कृपया ध्यान रखे कि "प्याज को काट कर अगले दिन सब्ज़ी बनाने के लिए नहीं रखना चाहिए क्योंकि ये बहुत खतरनाक है यहाँ तक कि कटी हुई प्याज एक रात में बहुत विषाक्त हो जाती है क्योंकि ये टॉक्सिक बैक्टेरिया बनाती है जो पेट खराब करने के लिए पर्याप्त रहता है "

ब्रह्म मुहूर्त में उठने की परंपरा क्यो ?

* ब्रह्म मुहूर्त में उठने की परंपरा क्यों ? *
रात्रि के अंतिम प्रहर के तत्काबाद का समय को ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं। हमारे ऋषि मुनियों ने इस मुहूर्त का विशेष महत्व बताया है। उनके अनुसार यह समय निद्रा त्याग के लिए सर्वोत्तम है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने से सौंदर्य, बल, विद्या, बुद्धि और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। सूर्योदय से चार घड़ी (लगभग डेढ़ घण्टे) पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में ही जग जाना चाहिये। इस समय सोना शास्त्र निषिद्ध है।
ब्रह्म  मुहूर्त यानी अनुकूल समय। रात्रि का अंतिम प्रहर अर्थात प्रात: 4 से 5.30 बजे का समय ब्रह्म मुहूर्त कहा जा सकता है।*
*“ब्रह्ममुहूर्ते या निद्रा सा पुण्यक्षयकारिणी”।*
(ब्रह्ममुहूर्त की निद्रा पुण्य का नाश करने वाली होती है।)
सिख मत में इस समय के लिए बेहद सुन्दर नाम है--*"अमृत वेला"* ईश्वर भक्ति के लिए यह महत्व स्वयं ही साबित हो जाता है। ईश्वर भक्ति के लिए यह सर्वश्रेष्ठ समय है। इस समय उठने से मनुष्य को सौंदर्य, लक्ष्मी, बुद्धि, स्वास्थ्य आदि की प्राप्ति होती है। उसका मन शांत और तन पवित्र होता है।
*ब्रह्म मुहूर्त* में उठना हमारे जीवन के लिए बहुत लाभकारी है। इससे हमारा शरीर स्वस्थ होता है और दिनभर स्फूर्ति बनी रहती है। स्वस्थ रहने और सफल होने का यह ऐसा फार्मूला है जिसमें खर्च कुछ नहीं होता। केवल आलस्य छोड़ने की जरूरत है।
*पौराणिक महत्व* -- वाल्मीकि रामायण  के अनुसार श्रीहनुमान ब्रह्ममुहूर्त में ही अशोक वाटिका पहुंचे। जहां उन्होंने वेद मंत्रो का पाठ करते माता सीता को सुना
शास्त्रों में भी इसका उल्लेख है--
*वर्णं कीर्तिं मतिं लक्ष्मीं स्वास्थ्यमायुश्च विदन्ति।*
*ब्राह्मे मुहूर्ते संजाग्रच्छि वा पंकज यथा॥*
अर्थात- ब्रह्म मुहूर्त में उठने से व्यक्ति को सुंदरता, लक्ष्मी, बुद्धि, स्वास्थ्य, आयु आदि की प्राप्ति होती है। ऐसा करने से शरीर कमल की तरह सुंदर हो जाता हे।
*ब्रह्म मुहूर्त और प्रकृति :--*
ब्रह्म मुहूर्त और प्रकृति का गहरा नाता है। इस समय में पशु-पक्षी जाग जाते हैं। उनका मधुर कलरव शुरू हो जाता है। कमल का फूल भी खिल उठता है। मुर्गे बांग देने लगते हैं। एक तरह से प्रकृति भी ब्रह्म मुहूर्त में चैतन्य हो जाती है। यह प्रतीक है उठने, जागने का। प्रकृति हमें संदेश देती है ब्रह्म मुहूर्त में उठने के लिए।
*इसलिए मिलती है सफलता व समृद्धि*
आयुर्वेद के अनुसार ब्रह्म मुहूर्त में उठकर टहलने से शरीर में संजीवनी शक्ति का संचार होता है। यही कारण है कि इस समय बहने वाली वायु को अमृततुल्य कहा गया है। इसके अलावा यह समय अध्ययन के लिए भी सर्वोत्तम बताया गया है क्योंकि रात को आराम करने के बाद सुबह जब हम उठते हैं तो शरीर तथा मस्तिष्क में भी स्फूर्ति व ताजगी बनी रहती है
*ब्रह्ममुहूर्त के धार्मिक, पौराणिक व व्यावहारिक पहलुओं और लाभ को जानकर हर रोज इस शुभ घड़ी में जागना शुरू करें तो बेहतर नतीजे मिलेंगे।*

ब्रह्म मुहूर्त में उठने वाला व्यक्ति सफल, सुखी और समृद्ध होता है, क्यों? क्योंकि जल्दी उठने से दिनभर के कार्यों और योजनाओं को बनाने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है। इसलिए न केवल जीवन सफल होता है। शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहने वाला हर व्यक्ति सुखी और समृद्ध हो सकता है। कारण वह जो काम करता है उसमें उसकी प्रगति होती है। विद्यार्थी परीक्षा में सफल रहता है। जॉब (नौकरी) करने वाले से बॉस खुश रहता है। बिजनेसमैन अच्छी कमाई कर सकता है। बीमार आदमी की आय तो प्रभावित होती ही है, उल्टे खर्च बढऩे लगता है। सफलता उसी के कदम चूमती है जो समय का सदुपयोग करे और स्वस्थ रहे। अत: स्वस्थ और सफल रहना है तो ब्रह्म मुहूर्त में उठें।
*वेदों में भी ब्रह्म मुहूर्त में उठने का महत्व और उससे होने वाले लाभ का उल्लेख किया गया है।*
प्रातारत्नं प्रातरिष्वा दधाति तं चिकित्वा प्रतिगृह्यनिधत्तो।
तेन प्रजां वर्धयमान आयू रायस्पोषेण सचेत सुवीर:॥ - ऋग्वेद-1/125/1
अर्थात- सुबह सूर्य उदय होने से पहले उठने वाले व्यक्ति का स्वास्थ्य अच्छा रहता है। इसीलिए बुद्धिमान लोग इस समय को व्यर्थ नहीं गंवाते। सुबह जल्दी उठने वाला व्यक्ति स्वस्थ, सुखी, ताकतवाला और दीर्घायु होता है।
यद्य सूर उदितोऽनागा मित्रोऽर्यमा। सुवाति सविता भग:॥ - सामवेद-35
अर्थात- व्यक्ति को सुबह सूर्योदय से पहले शौच व स्नान कर लेना चाहिए। इसके बाद भगवान की उपासना करना चाहिए। इस समय की शुद्ध व निर्मल हवा से स्वास्थ्य और संपत्ति की वृद्धि होती है।
उद्यन्त्सूर्यं इव सुप्तानां द्विषतां वर्च आददे।
अथर्ववेद- 7/16/२
अर्थात- सूरज उगने के बाद भी जो नहीं उठते या जागते उनका तेज खत्म हो जाता है।
व्यावहारिक महत्व - व्यावहारिक रूप से अच्छी सेहत, ताजगी और ऊर्जा पाने के लिए ब्रह्ममुहूर्त बेहतर समय है। क्योंकि रात की नींद के बाद पिछले दिन की शारीरिक और मानसिक थकान उतर जाने पर दिमाग शांत और स्थिर रहता है। वातावरण और हवा भी स्वच्छ होती है!
*जैविक घड़ी पर आधारित शरीर की दिनचर्या*:--
प्रातः 3 से 5 – इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से फेफड़ों में होती है। थोड़ा गुनगुना पानी पीकर खुली हवा में घूमना एवं प्राणायाम करना । इस समय दीर्घ श्वसन करने से फेफड़ों की कार्यक्षमता खूब विकसित होती है। उन्हें शुद्ध वायु (आक्सीजन) और ऋण आयन विपुल मात्रा में मिलने से शरीर स्वस्थ व स्फूर्तिमान होता है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने वाले लोग बुद्धिमान व उत्साही होते है, और सोते रहने वालों का जीवन निस्तेज हो जाता है ।
प्रातः 5 से 7 – इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से आंत में होती है। प्रातः जागरण से लेकर सुबह 7 बजे के बीच मल-त्याग एवं स्नान का लेना चाहिए । सुबह 7 के बाद जो मल-त्याग करते है उनकी आँतें मल में से त्याज्य द्रवांश का शोषण कर मल को सुखा देती हैं। इससे कब्ज तथा कई अन्य रोग उत्पन्न होते हैं।
प्रातः 7 से 9 – इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से आमाशय में होती है। यह समय भोजन के लिए उपर्युक्त है । इस समय पाचक रस अधिक बनते हैं। भोजन के बीच-बीच में गुनगुना पानी (अनुकूलता अनुसार) घूँट-घूँट पिये।
प्रातः 11 से 1 – इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से हृदय में होती है।
दोपहर 12 बजे के आस–पास मध्याह्न – संध्या (आराम) करने की हमारी संस्कृति में विधान है। इसी लिए भोजन वर्जित है । इस समय तरल पदार्थ ले सकते है। जैसे मट्ठा पी सकते है। दही खा सकते है ।
दोपहर 1 से 3 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से छोटी आंत में होती है। इसका कार्य आहार से मिले पोषक तत्त्वों का अवशोषण व व्यर्थ पदार्थों को बड़ी आँत की ओर धकेलना है। भोजन के बाद प्यास अनुरूप पानी पीना चाहिए । इस समय भोजन करने अथवा सोने से पोषक आहार-रस के शोषण में अवरोध उत्पन्न होता है व शरीर रोगी तथा दुर्बल हो जाता है ।
दोपहर 3 से 5 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से मूत्राशय में होती है । 2-4 घंटे पहले पिये पानी से इस समय मूत्र-त्याग की प्रवृति होती है।
शाम 5 से 7 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से गुर्दे में होती है । इस समय हल्का भोजन कर लेना चाहिए । शाम को सूर्यास्त से 40 मिनट पहले भोजन कर लेना उत्तम रहेगा। सूर्यास्त के 10 मिनट पहले से 10 मिनट बाद तक (संध्याकाल) भोजन न करे। शाम को भोजन के तीन घंटे बाद दूध पी सकते है । देर रात को किया गया भोजन सुस्ती लाता है यह अनुभवगम्य है।
रात्री 7 से 9 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से मस्तिष्क में होती है । इस समय मस्तिष्क विशेष रूप से सक्रिय रहता है । अतः प्रातःकाल के अलावा इस काल में पढ़ा हुआ पाठ जल्दी याद रह जाता है । आधुनिक अन्वेषण से भी इसकी पुष्टी हुई है।
रात्री 9 से 11 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से रीढ़ की हड्डी में स्थित मेरुरज्जु में होती है। इस समय पीठ के बल या बायीं करवट लेकर विश्राम करने से मेरूरज्जु को प्राप्त शक्ति को ग्रहण करने में मदद मिलती है। इस समय की नींद सर्वाधिक विश्रांति प्रदान करती है । इस समय का जागरण शरीर व बुद्धि को थका देता है । यदि इस समय भोजन किया जाय तो वह सुबह तक जठर में पड़ा रहता है, पचता नहीं और उसके सड़ने से हानिकारक द्रव्य पैदा होते हैं जो अम्ल (एसिड) के साथ आँतों में जाने से रोग उत्पन्न करते हैं। इसलिए इस समय भोजन करना खतरनाक है।
रात्री 11 से 1 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से पित्ताशय में होती है । इस समय का जागरण पित्त-विकार, अनिद्रा , नेत्ररोग उत्पन्न करता है व बुढ़ापा जल्दी लाता है । इस समय नई कोशिकाएं बनती है ।
रात्री 1 से 3 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से लीवर में होती है । अन्न का सूक्ष्म पाचन करना यह यकृत का कार्य है। इस समय का जागरण यकृत (लीवर) व पाचन-तंत्र को बिगाड़ देता है । इस समय यदि जागते रहे तो शरीर नींद के वशीभूत होने लगता है, दृष्टि मंद होती है और शरीर की प्रतिक्रियाएं मंद होती हैं। अतः इस समय सड़क दुर्घटनाएँ अधिक होती हैं।
नोट :-ऋषियों व आयुर्वेदाचार्यों ने बिना भूख लगे भोजन करना वर्जित बताया है। अतः प्रातः एवं शाम के भोजन की मात्रा ऐसी रखे, जिससे ऊपर बताए भोजन के समय में खुलकर भूख लगे। जमीन पर कुछ बिछाकर सुखासन में बैठकर ही भोजन करें। इस आसन में मूलाधार चक्र सक्रिय होने से जठराग्नि प्रदीप्त रहती है। कुर्सी पर बैठकर भोजन करने में पाचनशक्ति कमजोर तथा खड़े होकर भोजन करने से तो बिल्कुल नहींवत् हो जाती है। इसलिए ʹबुफे डिनरʹ से बचना चाहिए।
पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का लाभ लेने हेतु सिर पूर्व या दक्षिण दिशा में करके ही सोयें, अन्यथा अनिद्रा जैसी तकलीफें होती हैं।
शरीर की जैविक घड़ी को ठीक ढंग से चलाने हेतु रात्रि को बत्ती बंद करके सोयें। इस संदर्भ में हुए शोध चौंकाने वाले हैं। देर रात तक कार्य या अध्ययन करने से और बत्ती चालू रख के सोने से जैविक घड़ी निष्क्रिय होकर भयंकर स्वास्थ्य-संबंधी हानियाँ होती हैं। अँधेरे में सोने से यह जैविक घड़ी ठीक ढंग से चलती है।
आजकल पाये जाने वाले अधिकांश रोगों का कारण अस्त-व्यस्त दिनचर्या व विपरीत आहार ही है। हम अपनी दिनचर्या शरीर की जैविक घड़ी के अनुरूप बनाये रखें तो शरीर के विभिन्न अंगों की सक्रियता का हमें अनायास ही लाभ मिलेगा। इस प्रकार थोड़ी-सी सजगता हमें स्वस्थ जीवन की प्राप्ति करा देगी।

Saturday, May 6, 2017

यूरिक एसिड

भीलवाड़ा (राज) 6 मई 2017 6:38 स्वस्थ भारत की ओर छोटा सा कदम....जो भी पोस्ट करता है उसके पीछे हमारा उद्देश्य सिर्फ आपकी अच्छी हेल्थ इन पोस्ट के नुस्खे अगर आप अपनाते है तो निश्चित ही आपके शरीर को लाभ और निरोगी काया रह सकेगी
  सिर्फ आपका अतीत
9024557118
*कितना भी पुरानी हो यूरिक एसिड की समस्या 5 दिन में हो जायेगी बिलकुल सही*
रक्त में यूरिक एसिड बढ़ जाने पर यूरिक एसिड हमारे जोड़ों में जाकर जमा हो जाता है. और वहां पर जाकर दर्द एवम सूजन का पर्याय बनता है. इसी परिस्थिति को Gout कहा जाता है. इसका अधिकतम असर मुख्यतः पैरों और हाथों के जोड़ों पर अधिक पड़ता है. ज़्यादातर भोजन में प्रोटीन ज्यादा लेने पर पैरों और हाथों के जोड़ों में सूजन वगैरह पैदा होती है जिस से दर्द भी बढ़ता है. ऐसे में आज हमको इसका प्राकृतिक और आयुर्वेदिक इलाज बताने जा रहें हैं. जिस से आप इस रोग पर सिर्फ 5 दिन के भीतर ही काबू पा सकते हैं.
सर्वप्रथम रोगी को चाहिए के वो अपना पंच कर्म करवा ले. पंचकर्म करवाने से शरीर की सारी गंदगी मल मूत्र के द्वारा बाहर निकल जाती है. ऐसे में शरीर के 90 फीसदी रोग सिर्फ पंचकर्म से ही दूर हो जाते हैं. यह बहुत आसान सी विधि है जो आयुर्वेद केन्द्रों पर की जाती है.
इसके बाद आपको जो 5 दिन तक करना है वो है Fast अर्थात व्रत. इसका मतलब ये नहीं है के आप कुछ भी खायेंगे पियेंगे नहीं. बस इसमें आप अनाज या दूध या दालें नहीं लेंगे इसकी जगह पर आप अपनी दिन चर्या हमारे कहे अनुसार करेंगे. और आपको इसका नतीजा 5 दिन में ही देखने को मिलेगा. तो आइये जाने.
सुबह शौच के बाद एक गिलास लौकी का जूस इसमें 50 मिली आंवले का रस मिला कर लेना शुरू करें. इसके आधे घंटे तक कुछ भी खाना पीना नहीं. इसके बाद एक गिलास गुनगुने पानी में 50 मिली एलो वेरा जेल मिला कर पियें. इसके आधे घंटे के बाद आप एक गिलास गुनगुना पानी पीजिये
सुबह नाश्ते में एक गिलास संतरे (मौसमी, किन्नू, माल्टा) इत्यादि का रस पिलायें. इसमें आप सेंधा नमक मिला सकते हैं. और इसके एक घंटे के बाद जितना हो सके उतना पानी रुक रुक कर पिलायें. संतरे का जूस जोड़ों में संग्रहित यूरिक एसिड को घोल कर दोबारा रक्त में डाल देता है. जहाँ से वह किडनी के द्वारा फ़िल्टर हो कर शरीर से बाहर निकल जाता है.
दोपहर में फिर से आप एक गिलास संतरे का रस सेंधा नमक मिला कर पीजिये. अभी अगर आपका कुछ खाने का मन हो तो सलाद वगैरह खाएं. और रात को भी यही आप दोहराएँ.
और दिन में बीच बीच में आप निम्बू पानी पीजिये, उसमे भी सिर्फ सेंधा नमक ही मिलाएं चीनी नहीं मिलानी. पुरे दिन में अधिक से अधिक पानी पीजिये, आप जितना पानी पी सकती हैं उस से दो गुणा पानी पीजिये. दोपहर में आप छाछ भी पी सकते हैं.
यूरिक एसिड को शरीर से निकालने के लिए विटामिन सी बेहद उपयोगी है. जितना हो सके इन दिनों विटामिन सी का उपयोग करें. आंवला किसी भी रूप में खाइए. चाहे कैंडी, चाहे पाउडर, चाहे मुरब्बा.
और रात को सोते समय फिर से एक गिलास गर्म पानी में 50 मिली एलो वेरा मिला कर पीजिये.
ऐसा करने से आपको ज्यादा नहीं मात्र 2 दिन में ही फर्क देखने को मिलेगा. और हाँ इतने दिन आपको प्रोटीन वाली वस्तुओं से परहेज करना है जैसे के दूध, पनीर, दालें इत्यादि.
फ़ूड जो आप पुरे दिन भर में खाने हैं. इसके साथ में आप सेब, आंवला, पत्तागोभी, गाजर, खीरा, टमाटर, शिमला मिर्च, चुकंदर, अंगूर, अमरुद, चेरी, पपीता इत्यादि फल खा सकते हैं. इसके साथ में अलसी और अखरोट का सेवन करें.
आशा करते हैं के हमारे द्वारा दी गयी जानकारी आपको अच्छी लगी होगी. अगर आप पंच कर्म ना कर सकें तो पहले दो दिन तक केवल गर्म पानी पीजिये, और रात को सोते समय एक गिलास गर्म दूध में 5 मिली अरंडी का तेल मिला कर पीजिये. जिस से आपको दस्त हों और आपका शरीर में जमा हुआ गंद बाहर निकले. अगर आप इसका पूरा फायदा उठाना चाहतें हैं तो पंचकर्म ज़रूर करवाएं. आप खुद ही दो चार दिन में इस दर्द से ही नहीं अपितु अनेक बिमारियों से मुक्त हो जायेंगे.

Thursday, May 4, 2017

अस्थमा (Asthama)

अस्थमा क्या है ?  करे ये उपाय -
द्वारा :- आयुर्वेदाचार्य डॉ. अनुपम ढवले B.A.M.S. MD(AM), Reiki Grandmaster (U.S.A.), Acupressure, Su-Jok therapy practitioner and trainer    (संचालक - गोदावरी हेल्थकेअर &  होलिस्टिक हीलिंग सेण्टर ) MOb- 07385016383
जब किसी व्यक्ति की सूक्ष्म श्वास नलियों में कोई रोग उत्पन्न हो जाता है तो उस व्यक्ति को सांस लेने मे परेशानी होने लगती है जिसके कारण उसे खांसी होने लगती है। इस स्थिति को दमा रोग कहते हैं-
अस्थमा (Asthma) एक गंभीर बीमारी है, जो श्वास नलिकाओं को प्रभावित करती है। श्वास नलिकाएं फेफड़े से हवा को अंदर-बाहर करती हैं-
अस्थमा होने पर इन नलिकाओं की भीतरी दीवार में सूजन होता है। यह सूजन नलिकाओं को बेहद संवेदनशील बना देता है और किसी भी बेचैन करनेवाली चीज के स्पर्श से यह तीखी प्रतिक्रिया करता है। जब नलिकाएं प्रतिक्रिया करती हैं, तो उनमें संकुचन होता है और उस स्थिति में फेफड़े में हवा की कम मात्रा जाती है। इससे खांसी, नाक बजना, छाती का कड़ा होना, रात और सुबह में सांस लेने में तकलीफ आदि जैसे लक्षण पैदा होते हैं।
अस्थमा एक अथवा एक से अधिक पदार्थों (एलर्जेन) के प्रति शारीरिक प्रणाली की अस्वीकृति (एलर्जी) है। इसका अर्थ है कि हमारे शरीर की प्रणाली उन विशेष पदार्थों को सहन नहीं कर पाती और जिस रूप में अपनी प्रतिक्रिया या विरोध प्रकट करती है, उसे एलर्जी कहते हैं। हमारी श्वसन प्रणाली जब किन्हीं एलर्जेंस के प्रति एलर्जी प्रकट करती है तो वह अस्थमा होता है। यह साँस संबंधी रोगों में सबसे अधिक कष्टदायी है। अस्थमा के रोगी को सांस फूलने या साँस न आने के दौरे बार-बार पड़ते हैं और उन दौरों के बीच वह अकसर पूरी तरह सामान्य भी हो जाता है।
आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों में तो दमा का कोई स्थायी इलाज नहीं है लेकिन, आयुर्वेद के द्वारा इसे आसानी से पूरी तरह ठीक किया जा सकता है। हर साल हमारे सेण्टर से सैकड़ों लोग कूरियर द्वारा दवाई मंगवा कर इसे पूरी तरह ठीक हो चुके है ।  इस मैसेज द्वारा हमारा उद्देश्य अस्थमा के ऐसे उपायों को आप के साथ शेयर करना है, जीने इस्तेमाल कर आप इस रोग से छुटकारा पा सके । अगर हो सके तो  इस मैसेज को १० लोगों के साथ शेयर करना है ताकि, दमे से पीड़ित व्यक्ति सामान्य जीवन व्यतीत कर सके।  फॉरवर्ड करने की कोई कसम नहीं है, बस किसी के जीवन में मुस्कराहट लाने की एक वजह है ।
आज का विषय :- अस्थमा क्या है ?  करे ये उपाय -
-दमा रोग से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन नींबू तथा शहद को पानी में मिलाकर पीना चाहिए और फिर उपवास रखना चाहिए। इसके बाद 1 सप्ताह तक फलों का रस या हरी सब्जियों का रस तथा सूप पीकर उपवास रखना चाहिए। फिर इसके बाद 2 सप्ताह तक बिना पका हुआ भोजन करना चाहिए। इसके बाद साधारण भोजन करना चाहिए।
-सबसे पहले पेट पर मिट्टी की पट्टी सुबह-शाम रखकर कब्ज के कारण आतों में सचित मल को मुलायम करे। तत्पश्चात एनिमा या वस्ति क्रिया अथवा अरंडी के तेल से ‘गणेश क्रिया’ करके कब्ज को तोड़े।
-नाक के बढ़े हुए मास या हड्डी से छुटकारा पाने के लिए तेल नेति, रबर नेति व नमक पड़े हुए गर्म पानी से जल नेति करे।
-फेफड़े में बसी ठडक निकालने के लिए छाती और पीठ पर कोई गर्म तासीर वाला तेल लगाकर ऊपर से रुई की पर्त बिछाकर रात भर या दिन भर बनियान पहने रहें।
-बायीं नासिका के छिद्र में रुई लगाकर बन्द कर लेने से दाहिनी नासिका ही चलेगी। इस स्वर चिकित्सा से दमा के रोगियों को बहुत आराम मिलता है।
-भोजन में प्रात: तुलसी, अदरक, गुलबनफसा आदि की चाय या सब्जी का सूप, दोपहर में सादी रोटी व हरी सब्जी, गर्म दाल, तीसरे पहर सूप या देशी चाय और रात्रि में सादे तरीके से बनी मिश्रित हरी सब्जिया माइक्रोवेब या कुकर से वाष्पित (स्ट्रीम्ड) सब्जियों का सेवन करे।
-दमा रोग से पीड़ित रोगी को रात के समय में जल्दी ही भोजन करके सो जाना चाहिए तथा रात को सोने से पहले गर्म पानी को पीकर सोना चाहिए तथा अजवायन के पानी की भाप लेनी चाहिए। इससे रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
-दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपनी छाती पर तथा अपनी रीढ़ की हड्डी पर सरसों के तेल में कपूर डालकर मालिश -करनी चाहिए तथा इसके बाद भापस्नान करना चाहिए। ऐसा प्रतिदिन करने से रोगी का रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
-दमा रोग को ठीक करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार कई प्रकार के आसन भी है जिनको करने से दमा रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है। ये आसन इस प्रकार हैं- योगमुद्रासन, मकरासन, शलभासन, अश्वस्थासन, ताड़ासन, उत्तान कूर्मासन, नाड़ीशोधन, कपालभाति, बिना कुम्भक के प्राणायाम, उड्डीयान बंध, महामुद्रा, श्वास-प्रश्वास, गोमुखासन, मत्स्यासन, उत्तामन्डूकासन, धनुरासन तथा भुजांगासन आदि।
-कंबल या दरी बिछाकर घुटनों के बल लेट जाएं और अपने दाहिने पांव को घुटने से मोड़कर नितंब के नीचे लगा दें। अब बाएं पांव को भी घुटने से मोड़कर, बाएं भुजदण्ड पर रख लें और दोनों हाथों को गर्दन के पीछे ले जाकर परस्पर मिला लें। इस आसन की यही पूर्ण स्थिति है।इस आसन से फेंफड़ों में शक्ति आती है। दमा और क्षय आदि रोगों को यह शांत करता है। साथ ही हाथ-पांवों में लचीलापन और दृढ़ता लाकर उन्हें मजबूत बनाता है। यह आसन लड़के और लड़कियों के लिए बेहद फायदेमंद है।
-दमा रोग से पीड़ित रोगी को सुबह के समय में रीढ़ की हड्डी को सीधे रखकर खुली और साफ स्वच्छ वायु में 7 से 8 बार गहरी सांस लेनी चाहिए और छोड़नी चाहिए तथा कुछ दूर सुबह के समय में टहलना चाहिए।
-दमा रोग से पीड़ित रोगी को चिंता और मानसिक रोगों से बचना चाहिए क्योंकि ये रोग दमा के दौरे को और तेज कर देते हैं।
-दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपने पेट को साफ रखना चाहिए तथा कभी कब्ज नहीं होने देना चाहिए।
-दमा रोग से पीड़ित रोगी को धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों के साथ नहीं रहना चाहिए तथा धूम्रपान भी नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से इस रोग का प्रकोप और अधिक बढ़ सकता है।
-दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपने पेड़ू पर मिट्टी की पट्टी और उसके बाद गुनगुने जल का एनिमा लेना चाहिए। फिर लगभग 10 मिनट के बाद सुनहरी बोतल का सूर्यतप्त जल जो प्राकृतिक चिकित्सा से बनाया गया है उसे लगभग 25 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन पीना चाहिए। इस प्रकार की क्रिया को प्रतिदिन नियमपूर्वक करने से दमा रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
-दमा रोग से पीड़ित रोगी को सप्ताह में 2-3 बार सुबह के समय में कुल्ला-दातुन करना चाहिए। इसके बाद लगभग डेढ़ लीटर गुनगुने पानी में 15 ग्राम सेंधानमक मिलाकर धीरे-धीरे पीकर फिर गले में उंगुली डालकर उल्टी कर देनी चाहिए। इससे रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
-दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपने रोग के होने के कारणों को सबसे पहले दूर करना चाहिए और इसके बाद इस रोग को बढ़ाने वाली चीजों से परहेज करना चहिए। फिर इस रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार कराना चाहिए।
-इस रोग से पीड़ित रोगी को कभी घबराना नहीं चाहिए क्योंकि ऐसा करने से दौरे की तीव्रता (तेजी) बढ़ सकती है।
-दमा रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी को कम से कम 10 मिनट तक कुर्सी पर बैठाना चाहिए क्योंकि आराम करने से फेफड़े ठंडे हो जाते हैं। इसके बाद रोगी को होंठों से थोड़ी-थोड़ी मात्रा में हवा खींचनी चाहिए और धीरे-धीरे सांस लेनी चाहिए। इस प्रकार से प्रतिदिन उपचार करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है। दमा रोग से पीड़ित रोगी को गर्म बिस्तर पर सोना चाहिए।
-दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपनी रीढ़ की हड्डी की मालिश करवानी चाहिए तथा इसके साथ-साथ कमर पर गर्म सिंकाई करवानी चाहिए। इसके बाद रोगी को अपनी छाती पर न्यूट्राल लपेट करवाना चाहिए। इस प्रकार से प्रतिदिन उपचार करने से कुछ ही दिनों में दमा रोग ठीक हो जाता है।
-शरीर शोधन में कफ के निवारण के लिए वमन (उल्टी) लाभप्रद उपाय है। श्वास के रोगी को आमाशय, आतों और फेफड़ों के शुद्धीकरण के लिए ‘अमलतास’ का विरेचन विशेष लाभप्रद है। इसके लिए 250 मि.ली. पानी में 5 से 10 ग्राम अमलतास का गूदा उबालें। चौथाई शेष रहने पर छानकर रात को सोते समय दमा पीड़ित शख्स को चाय की तरह पिला दें।हमेशा खुश रहें , खिलखिलाकर हंसें और अपनी जीवनशैली संयमित रखें।
अस्थमा की दवाई उपलब्ध :-
यदि आप अस्थमा से परेशान है तो आप हमारे सेण्टर से विशेष आयुर्वेद विधि से निर्मित दवाई अपने घर बैठे कूरियर से मंगवा सकते है
दवाई में निम्नलिखित चीजे समाविष्ट रहेगी
1) पेट में लेने हेतु 2 प्रकार की दवाई
2)  अस्थमा के लिए विशेष आयुएवेदिक विधि से तैयार काढ़ा
४) साथ ही सम्पूर्ण डाइट चार्ट
५) पथ्य पथ्य का विशेष विवरण
दवाई पूर्णतः आयुर्वेदिक तथा किसी भी आयु के लिए सुरक्षित है, दवाई लेते ही 15 दिनों में असर दिखाना शुरू हो जाता है । 6 महीने में अस्थमा पूरी तरह से समाप्त हो जायेगा ।
१ महीने के दवाई की कीमत मात्रा २१०० रूपये । दवाई मंगवाने हेतु निचे दिए गए नंबर पर संपर्क करें ।
@ आयुर्वेदाचार्य डॉ. अनुपम ढवले  +917385016383
अगर आप भी हेल्थ टिप्स चाहते है तो बस आप अपने प्रिय व्हाट्स एप्प ग्रुप मैं इस नंबर  (आयुर्वेदाचार्य डॉ. अनुपम ढवले ) +917385016383  को ग्रुप मैं जोड़े और यह अधिक से अधिक लोगों के लिए उपलब्ध करायें.
कृपया ध्यान दे :-  हमारा कॊइ भी ग्रुप नहीं है, अतः ग्रुप में सामिल करवाने हेतु अनावश्यक मेसेजेस न भेजे । टिप्स पाने के लिए हमारा नंबर अपने ग्रुप में ऐड करवाये, या अपने और अपने मित्रों का ग्रुप बना कर इस नंबर  +917385016383  को उसमे ऐड करे  ।
एक सामाजिक जिम्मेदारी के तहत इसे सभी लोगों तक पहुचाएं ।