Saturday, May 6, 2017

यूरिक एसिड

भीलवाड़ा (राज) 6 मई 2017 6:38 स्वस्थ भारत की ओर छोटा सा कदम....जो भी पोस्ट करता है उसके पीछे हमारा उद्देश्य सिर्फ आपकी अच्छी हेल्थ इन पोस्ट के नुस्खे अगर आप अपनाते है तो निश्चित ही आपके शरीर को लाभ और निरोगी काया रह सकेगी
  सिर्फ आपका अतीत
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*कितना भी पुरानी हो यूरिक एसिड की समस्या 5 दिन में हो जायेगी बिलकुल सही*
रक्त में यूरिक एसिड बढ़ जाने पर यूरिक एसिड हमारे जोड़ों में जाकर जमा हो जाता है. और वहां पर जाकर दर्द एवम सूजन का पर्याय बनता है. इसी परिस्थिति को Gout कहा जाता है. इसका अधिकतम असर मुख्यतः पैरों और हाथों के जोड़ों पर अधिक पड़ता है. ज़्यादातर भोजन में प्रोटीन ज्यादा लेने पर पैरों और हाथों के जोड़ों में सूजन वगैरह पैदा होती है जिस से दर्द भी बढ़ता है. ऐसे में आज हमको इसका प्राकृतिक और आयुर्वेदिक इलाज बताने जा रहें हैं. जिस से आप इस रोग पर सिर्फ 5 दिन के भीतर ही काबू पा सकते हैं.
सर्वप्रथम रोगी को चाहिए के वो अपना पंच कर्म करवा ले. पंचकर्म करवाने से शरीर की सारी गंदगी मल मूत्र के द्वारा बाहर निकल जाती है. ऐसे में शरीर के 90 फीसदी रोग सिर्फ पंचकर्म से ही दूर हो जाते हैं. यह बहुत आसान सी विधि है जो आयुर्वेद केन्द्रों पर की जाती है.
इसके बाद आपको जो 5 दिन तक करना है वो है Fast अर्थात व्रत. इसका मतलब ये नहीं है के आप कुछ भी खायेंगे पियेंगे नहीं. बस इसमें आप अनाज या दूध या दालें नहीं लेंगे इसकी जगह पर आप अपनी दिन चर्या हमारे कहे अनुसार करेंगे. और आपको इसका नतीजा 5 दिन में ही देखने को मिलेगा. तो आइये जाने.
सुबह शौच के बाद एक गिलास लौकी का जूस इसमें 50 मिली आंवले का रस मिला कर लेना शुरू करें. इसके आधे घंटे तक कुछ भी खाना पीना नहीं. इसके बाद एक गिलास गुनगुने पानी में 50 मिली एलो वेरा जेल मिला कर पियें. इसके आधे घंटे के बाद आप एक गिलास गुनगुना पानी पीजिये
सुबह नाश्ते में एक गिलास संतरे (मौसमी, किन्नू, माल्टा) इत्यादि का रस पिलायें. इसमें आप सेंधा नमक मिला सकते हैं. और इसके एक घंटे के बाद जितना हो सके उतना पानी रुक रुक कर पिलायें. संतरे का जूस जोड़ों में संग्रहित यूरिक एसिड को घोल कर दोबारा रक्त में डाल देता है. जहाँ से वह किडनी के द्वारा फ़िल्टर हो कर शरीर से बाहर निकल जाता है.
दोपहर में फिर से आप एक गिलास संतरे का रस सेंधा नमक मिला कर पीजिये. अभी अगर आपका कुछ खाने का मन हो तो सलाद वगैरह खाएं. और रात को भी यही आप दोहराएँ.
और दिन में बीच बीच में आप निम्बू पानी पीजिये, उसमे भी सिर्फ सेंधा नमक ही मिलाएं चीनी नहीं मिलानी. पुरे दिन में अधिक से अधिक पानी पीजिये, आप जितना पानी पी सकती हैं उस से दो गुणा पानी पीजिये. दोपहर में आप छाछ भी पी सकते हैं.
यूरिक एसिड को शरीर से निकालने के लिए विटामिन सी बेहद उपयोगी है. जितना हो सके इन दिनों विटामिन सी का उपयोग करें. आंवला किसी भी रूप में खाइए. चाहे कैंडी, चाहे पाउडर, चाहे मुरब्बा.
और रात को सोते समय फिर से एक गिलास गर्म पानी में 50 मिली एलो वेरा मिला कर पीजिये.
ऐसा करने से आपको ज्यादा नहीं मात्र 2 दिन में ही फर्क देखने को मिलेगा. और हाँ इतने दिन आपको प्रोटीन वाली वस्तुओं से परहेज करना है जैसे के दूध, पनीर, दालें इत्यादि.
फ़ूड जो आप पुरे दिन भर में खाने हैं. इसके साथ में आप सेब, आंवला, पत्तागोभी, गाजर, खीरा, टमाटर, शिमला मिर्च, चुकंदर, अंगूर, अमरुद, चेरी, पपीता इत्यादि फल खा सकते हैं. इसके साथ में अलसी और अखरोट का सेवन करें.
आशा करते हैं के हमारे द्वारा दी गयी जानकारी आपको अच्छी लगी होगी. अगर आप पंच कर्म ना कर सकें तो पहले दो दिन तक केवल गर्म पानी पीजिये, और रात को सोते समय एक गिलास गर्म दूध में 5 मिली अरंडी का तेल मिला कर पीजिये. जिस से आपको दस्त हों और आपका शरीर में जमा हुआ गंद बाहर निकले. अगर आप इसका पूरा फायदा उठाना चाहतें हैं तो पंचकर्म ज़रूर करवाएं. आप खुद ही दो चार दिन में इस दर्द से ही नहीं अपितु अनेक बिमारियों से मुक्त हो जायेंगे.

Thursday, May 4, 2017

अस्थमा (Asthama)

अस्थमा क्या है ?  करे ये उपाय -
द्वारा :- आयुर्वेदाचार्य डॉ. अनुपम ढवले B.A.M.S. MD(AM), Reiki Grandmaster (U.S.A.), Acupressure, Su-Jok therapy practitioner and trainer    (संचालक - गोदावरी हेल्थकेअर &  होलिस्टिक हीलिंग सेण्टर ) MOb- 07385016383
जब किसी व्यक्ति की सूक्ष्म श्वास नलियों में कोई रोग उत्पन्न हो जाता है तो उस व्यक्ति को सांस लेने मे परेशानी होने लगती है जिसके कारण उसे खांसी होने लगती है। इस स्थिति को दमा रोग कहते हैं-
अस्थमा (Asthma) एक गंभीर बीमारी है, जो श्वास नलिकाओं को प्रभावित करती है। श्वास नलिकाएं फेफड़े से हवा को अंदर-बाहर करती हैं-
अस्थमा होने पर इन नलिकाओं की भीतरी दीवार में सूजन होता है। यह सूजन नलिकाओं को बेहद संवेदनशील बना देता है और किसी भी बेचैन करनेवाली चीज के स्पर्श से यह तीखी प्रतिक्रिया करता है। जब नलिकाएं प्रतिक्रिया करती हैं, तो उनमें संकुचन होता है और उस स्थिति में फेफड़े में हवा की कम मात्रा जाती है। इससे खांसी, नाक बजना, छाती का कड़ा होना, रात और सुबह में सांस लेने में तकलीफ आदि जैसे लक्षण पैदा होते हैं।
अस्थमा एक अथवा एक से अधिक पदार्थों (एलर्जेन) के प्रति शारीरिक प्रणाली की अस्वीकृति (एलर्जी) है। इसका अर्थ है कि हमारे शरीर की प्रणाली उन विशेष पदार्थों को सहन नहीं कर पाती और जिस रूप में अपनी प्रतिक्रिया या विरोध प्रकट करती है, उसे एलर्जी कहते हैं। हमारी श्वसन प्रणाली जब किन्हीं एलर्जेंस के प्रति एलर्जी प्रकट करती है तो वह अस्थमा होता है। यह साँस संबंधी रोगों में सबसे अधिक कष्टदायी है। अस्थमा के रोगी को सांस फूलने या साँस न आने के दौरे बार-बार पड़ते हैं और उन दौरों के बीच वह अकसर पूरी तरह सामान्य भी हो जाता है।
आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों में तो दमा का कोई स्थायी इलाज नहीं है लेकिन, आयुर्वेद के द्वारा इसे आसानी से पूरी तरह ठीक किया जा सकता है। हर साल हमारे सेण्टर से सैकड़ों लोग कूरियर द्वारा दवाई मंगवा कर इसे पूरी तरह ठीक हो चुके है ।  इस मैसेज द्वारा हमारा उद्देश्य अस्थमा के ऐसे उपायों को आप के साथ शेयर करना है, जीने इस्तेमाल कर आप इस रोग से छुटकारा पा सके । अगर हो सके तो  इस मैसेज को १० लोगों के साथ शेयर करना है ताकि, दमे से पीड़ित व्यक्ति सामान्य जीवन व्यतीत कर सके।  फॉरवर्ड करने की कोई कसम नहीं है, बस किसी के जीवन में मुस्कराहट लाने की एक वजह है ।
आज का विषय :- अस्थमा क्या है ?  करे ये उपाय -
-दमा रोग से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन नींबू तथा शहद को पानी में मिलाकर पीना चाहिए और फिर उपवास रखना चाहिए। इसके बाद 1 सप्ताह तक फलों का रस या हरी सब्जियों का रस तथा सूप पीकर उपवास रखना चाहिए। फिर इसके बाद 2 सप्ताह तक बिना पका हुआ भोजन करना चाहिए। इसके बाद साधारण भोजन करना चाहिए।
-सबसे पहले पेट पर मिट्टी की पट्टी सुबह-शाम रखकर कब्ज के कारण आतों में सचित मल को मुलायम करे। तत्पश्चात एनिमा या वस्ति क्रिया अथवा अरंडी के तेल से ‘गणेश क्रिया’ करके कब्ज को तोड़े।
-नाक के बढ़े हुए मास या हड्डी से छुटकारा पाने के लिए तेल नेति, रबर नेति व नमक पड़े हुए गर्म पानी से जल नेति करे।
-फेफड़े में बसी ठडक निकालने के लिए छाती और पीठ पर कोई गर्म तासीर वाला तेल लगाकर ऊपर से रुई की पर्त बिछाकर रात भर या दिन भर बनियान पहने रहें।
-बायीं नासिका के छिद्र में रुई लगाकर बन्द कर लेने से दाहिनी नासिका ही चलेगी। इस स्वर चिकित्सा से दमा के रोगियों को बहुत आराम मिलता है।
-भोजन में प्रात: तुलसी, अदरक, गुलबनफसा आदि की चाय या सब्जी का सूप, दोपहर में सादी रोटी व हरी सब्जी, गर्म दाल, तीसरे पहर सूप या देशी चाय और रात्रि में सादे तरीके से बनी मिश्रित हरी सब्जिया माइक्रोवेब या कुकर से वाष्पित (स्ट्रीम्ड) सब्जियों का सेवन करे।
-दमा रोग से पीड़ित रोगी को रात के समय में जल्दी ही भोजन करके सो जाना चाहिए तथा रात को सोने से पहले गर्म पानी को पीकर सोना चाहिए तथा अजवायन के पानी की भाप लेनी चाहिए। इससे रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
-दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपनी छाती पर तथा अपनी रीढ़ की हड्डी पर सरसों के तेल में कपूर डालकर मालिश -करनी चाहिए तथा इसके बाद भापस्नान करना चाहिए। ऐसा प्रतिदिन करने से रोगी का रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
-दमा रोग को ठीक करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार कई प्रकार के आसन भी है जिनको करने से दमा रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है। ये आसन इस प्रकार हैं- योगमुद्रासन, मकरासन, शलभासन, अश्वस्थासन, ताड़ासन, उत्तान कूर्मासन, नाड़ीशोधन, कपालभाति, बिना कुम्भक के प्राणायाम, उड्डीयान बंध, महामुद्रा, श्वास-प्रश्वास, गोमुखासन, मत्स्यासन, उत्तामन्डूकासन, धनुरासन तथा भुजांगासन आदि।
-कंबल या दरी बिछाकर घुटनों के बल लेट जाएं और अपने दाहिने पांव को घुटने से मोड़कर नितंब के नीचे लगा दें। अब बाएं पांव को भी घुटने से मोड़कर, बाएं भुजदण्ड पर रख लें और दोनों हाथों को गर्दन के पीछे ले जाकर परस्पर मिला लें। इस आसन की यही पूर्ण स्थिति है।इस आसन से फेंफड़ों में शक्ति आती है। दमा और क्षय आदि रोगों को यह शांत करता है। साथ ही हाथ-पांवों में लचीलापन और दृढ़ता लाकर उन्हें मजबूत बनाता है। यह आसन लड़के और लड़कियों के लिए बेहद फायदेमंद है।
-दमा रोग से पीड़ित रोगी को सुबह के समय में रीढ़ की हड्डी को सीधे रखकर खुली और साफ स्वच्छ वायु में 7 से 8 बार गहरी सांस लेनी चाहिए और छोड़नी चाहिए तथा कुछ दूर सुबह के समय में टहलना चाहिए।
-दमा रोग से पीड़ित रोगी को चिंता और मानसिक रोगों से बचना चाहिए क्योंकि ये रोग दमा के दौरे को और तेज कर देते हैं।
-दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपने पेट को साफ रखना चाहिए तथा कभी कब्ज नहीं होने देना चाहिए।
-दमा रोग से पीड़ित रोगी को धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों के साथ नहीं रहना चाहिए तथा धूम्रपान भी नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से इस रोग का प्रकोप और अधिक बढ़ सकता है।
-दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपने पेड़ू पर मिट्टी की पट्टी और उसके बाद गुनगुने जल का एनिमा लेना चाहिए। फिर लगभग 10 मिनट के बाद सुनहरी बोतल का सूर्यतप्त जल जो प्राकृतिक चिकित्सा से बनाया गया है उसे लगभग 25 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन पीना चाहिए। इस प्रकार की क्रिया को प्रतिदिन नियमपूर्वक करने से दमा रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
-दमा रोग से पीड़ित रोगी को सप्ताह में 2-3 बार सुबह के समय में कुल्ला-दातुन करना चाहिए। इसके बाद लगभग डेढ़ लीटर गुनगुने पानी में 15 ग्राम सेंधानमक मिलाकर धीरे-धीरे पीकर फिर गले में उंगुली डालकर उल्टी कर देनी चाहिए। इससे रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
-दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपने रोग के होने के कारणों को सबसे पहले दूर करना चाहिए और इसके बाद इस रोग को बढ़ाने वाली चीजों से परहेज करना चहिए। फिर इस रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार कराना चाहिए।
-इस रोग से पीड़ित रोगी को कभी घबराना नहीं चाहिए क्योंकि ऐसा करने से दौरे की तीव्रता (तेजी) बढ़ सकती है।
-दमा रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी को कम से कम 10 मिनट तक कुर्सी पर बैठाना चाहिए क्योंकि आराम करने से फेफड़े ठंडे हो जाते हैं। इसके बाद रोगी को होंठों से थोड़ी-थोड़ी मात्रा में हवा खींचनी चाहिए और धीरे-धीरे सांस लेनी चाहिए। इस प्रकार से प्रतिदिन उपचार करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है। दमा रोग से पीड़ित रोगी को गर्म बिस्तर पर सोना चाहिए।
-दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपनी रीढ़ की हड्डी की मालिश करवानी चाहिए तथा इसके साथ-साथ कमर पर गर्म सिंकाई करवानी चाहिए। इसके बाद रोगी को अपनी छाती पर न्यूट्राल लपेट करवाना चाहिए। इस प्रकार से प्रतिदिन उपचार करने से कुछ ही दिनों में दमा रोग ठीक हो जाता है।
-शरीर शोधन में कफ के निवारण के लिए वमन (उल्टी) लाभप्रद उपाय है। श्वास के रोगी को आमाशय, आतों और फेफड़ों के शुद्धीकरण के लिए ‘अमलतास’ का विरेचन विशेष लाभप्रद है। इसके लिए 250 मि.ली. पानी में 5 से 10 ग्राम अमलतास का गूदा उबालें। चौथाई शेष रहने पर छानकर रात को सोते समय दमा पीड़ित शख्स को चाय की तरह पिला दें।हमेशा खुश रहें , खिलखिलाकर हंसें और अपनी जीवनशैली संयमित रखें।
अस्थमा की दवाई उपलब्ध :-
यदि आप अस्थमा से परेशान है तो आप हमारे सेण्टर से विशेष आयुर्वेद विधि से निर्मित दवाई अपने घर बैठे कूरियर से मंगवा सकते है
दवाई में निम्नलिखित चीजे समाविष्ट रहेगी
1) पेट में लेने हेतु 2 प्रकार की दवाई
2)  अस्थमा के लिए विशेष आयुएवेदिक विधि से तैयार काढ़ा
४) साथ ही सम्पूर्ण डाइट चार्ट
५) पथ्य पथ्य का विशेष विवरण
दवाई पूर्णतः आयुर्वेदिक तथा किसी भी आयु के लिए सुरक्षित है, दवाई लेते ही 15 दिनों में असर दिखाना शुरू हो जाता है । 6 महीने में अस्थमा पूरी तरह से समाप्त हो जायेगा ।
१ महीने के दवाई की कीमत मात्रा २१०० रूपये । दवाई मंगवाने हेतु निचे दिए गए नंबर पर संपर्क करें ।
@ आयुर्वेदाचार्य डॉ. अनुपम ढवले  +917385016383
अगर आप भी हेल्थ टिप्स चाहते है तो बस आप अपने प्रिय व्हाट्स एप्प ग्रुप मैं इस नंबर  (आयुर्वेदाचार्य डॉ. अनुपम ढवले ) +917385016383  को ग्रुप मैं जोड़े और यह अधिक से अधिक लोगों के लिए उपलब्ध करायें.
कृपया ध्यान दे :-  हमारा कॊइ भी ग्रुप नहीं है, अतः ग्रुप में सामिल करवाने हेतु अनावश्यक मेसेजेस न भेजे । टिप्स पाने के लिए हमारा नंबर अपने ग्रुप में ऐड करवाये, या अपने और अपने मित्रों का ग्रुप बना कर इस नंबर  +917385016383  को उसमे ऐड करे  ।
एक सामाजिक जिम्मेदारी के तहत इसे सभी लोगों तक पहुचाएं ।

Wednesday, April 27, 2016

रामयण कोई कहानी नहीं

अमेरिकी वैज्ञानिकों ने किया दावा- सच में थे श्री राम, हनुमान और रावण
कुछ लोग मानते हैं कि रामायण और महाभारत की कथाओं जैसा कुछ नहीं था। वो केवल एक कल्पना थी और कुछ नहीं। पर अब कोई ऐसा नहीं कह पाएगा। क्योंकि अब इसका सबूत मिला है। अमेरिका के वैज्ञानिकों ने उस स्थान को खोज निकाला है जिसका जिक्र रामायण में पाताल लोक के रूप में किया गया है
कहा जाता है कि हनुमानजी ने प्रभु भगवान राम और लक्ष्मण को पातालपुरी के राजा अहिरावण के चंगुल से छुड़ाया था। राम-रावण युद्ध के दौरान अहिरावण ने राम-लक्ष्मण को अगवा कर बंधक बना कर रखा था। भगवान राम व लक्ष्मण को छुड़ाने के लिए बजरंगबली को पातालपुरी के रक्षक मकरध्वज को परास्त करना पड़ा था। मकरध्वज बजरंगबली के ही पुत्र थे, लिहाजा उनका स्वरूप बजरगंबली जैसा ही था।
ये जगह जहां उस काल से जुड़े प्रमाण मिलते हैं वो मध्य अमेरिकी महाद्वीप में पूर्वोत्तर होंडुरास के जंगलों के नीचे दफन है। अमेरिकी वैज्ञानिकों ने लाइडर तकनीकी से इसका 3-डी नक्शा तैयार किया है, जिसमें जमीन की गहराइयों में गदा जैसा हथियार लिए वानर देवता की मूर्ति होने की पुष्टि हुई है।
होंडुरास के जंगल की खुदाई पर प्रतिबंध के कारण इसकी ठीकठाक स्थिति का पता लगाना मुश्किल है। लेकिन इस की पुख्ता जानकारी के लिए होंडुरास सरकार ने आदेश जारी किये हैं। अमेरिकी इतिहासकार भी मानते हैं कि पूर्वोत्तर होंडुरास के घने जंगलों के बीच मस्कीटिया नाम के इलाके में हजारों साल पहले एक गुप्त शहर सियूदाद ब्लांका का वजूद था। वहां के लोग एक विशालकाय वानर मूर्ति की पूजा करते थे।
स्कूल ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज के निदेशक और वैदिक विज्ञान केन्द्र के प्रभारी प्रो. भरत राज सिंह ने बताया है कि पहले विश्व युद्ध के बाद एक अमेरिकी पायलट ने होंडुरास के जंगलों में कुछ अवशेष देखे थे। अमेरिकी पत्रिका 'डेली टाइम्स गज़ट' के मुताबिक इस शहर की पहली जानकारी अमेरिकी खोजकर्ता थिंयोडोर मोर्ड ने 1940 में दी थी। एक अमेरिकी पत्रिका में उसने उस प्राचीन शहर में वानर देवता की पूजा होने की बात भी लिखी थी, लेकिन उसने जगह का खुलासा नहीं किया था। बाद में रहस्यमय तरीके से थियोडोर की मौत हो गई और जगह का रहस्य बरकरार रहा।
करीब 70 साल बाद अमेरिका की ह्यूस्टन यूनिवर्सिटी व नेशनल सेंटर फार एयरबोर्न लेजर मैपिंग के वैज्ञानिकों ने होंडुरास के घने जंगलों में मस्कीटिया नामक स्थान पर लाइडर नामक तकनीक से जमीन के नीचे 3-डी मैपिंग की, जिसमें प्राचीन शहर का पता चला। इसमें जंगल के ऊपर से विमान से अरबों लेजर तरंगें जमीन पर फेंकी गईं। इससे 3-डी डिजिटल नक्शा तैयार हो गया। 3-डी नक्शे में जमीन के नीचे गहराइयों में मानव निर्मित कई वस्तुएं दिखाई दीं। इसमें हाथ में गदा जैसा हथियार लिए घुटनों के बल बैठी हुई है वानर मूर्ति भी दिखी है। अहिरावण के वध के बाद भगवान राम ने मकरध्वज को ही पातालपुरी का राजा बना दिया था।

हिंदुत्व परंपरा का महत्व

चप्पल बाहर क्यों उतारते हैं
मंदिर में प्रवेश नंगे पैर ही करना पड़ता है, यह नियम दुनिया के हर हिंदू मंदिर में है। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण यह है कि मंदिर की फर्शों का निर्माण पुराने समय से अब तक इस प्रकार किया जाता है कि ये इलेक्ट्रिक और मैग्नैटिक तरंगों का सबसे बड़ा स्त्रोत होती हैं। जब इन पर नंगे पैर चला जाता है तो अधिकतम ऊर्जा पैरों के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर जाती है।

दीपक के ऊपर हाथ घुमाने का वैज्ञानिक कारण
आरती के बाद सभी लोग दिए पर या कपूर के ऊपर हाथ रखते हैं और उसके बाद सिर से लगाते हैं और आंखों पर स्पर्श करते हैं। ऐसा करने से हल्के गर्म हाथों से दृष्टि इंद्री सक्रिय हो जाती है और बेहतर महसूस होता है।

मंदिर में घंटा लगाने का कारण
जब भी मंदिर में प्रवेश किया जाता है तो दरवाजे पर घंटा टंगा होता है जिसे बजाना होता है। मुख्य मंदिर (जहां भगवान की मूर्ति होती है) में भी प्रवेश करते समय घंटा या घंटी बजानी होती है, इसके पीछे कारण यह है कि इसे बजाने से निकलने वाली आवाज से सात सेकंड तक गूंज बनी रहती है जो शरीर के सात हीलिंग सेंटर्स को सक्रिय कर देती है।
 
भगवान की मूर्ति
मंदिर में भगवान की मूर्ति को गर्भ गृह के बिल्कुल बीच में रखा जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस जगह पर सबसे अधिक ऊर्जा होती है जहां सकारात्मक सोच से खड़े होने पर शरीर में सकारात्मक ऊर्जा पहुंचती है और नकारात्मकता दूर भाग जाती है।
 
परिक्रमा करने के पीछे वैज्ञानिक कारण
हर मुख्य मंदिर में दर्शन करने और पूजा करने के बाद परिक्रमा करनी होती है। परिक्रमा 8 से 9 बार करनी होती है। जब मंदिर में परिक्रमा की जाती है तो सारी सकारात्मक ऊर्जा, शरीर में प्रवेश कर जाती है और मन को शांति मिलती है।
 
मूर्ति पर फूल चढ़ाने के कारण
भगवान की मूर्ति पर फूल चढ़ाना भी एक परंपरा है। ऐसा करने से मंदिर परिसर में अच्छी और भीनी-भीनी सी खुश्बू आती है। अगरबत्ती, कपूर और फूलों की खुश्बू से सूंघने की शक्ति बढ़ती है और मन प्रसन्न हो जाता है।

Tuesday, April 26, 2016

क़ुतुब मीनार का सच

क़ुतुब मीनार का सच,किसने बनवाई ,कब बनवाई
दिल्ली में स्थित क़ुतुब मीनार का नाम तो आप सुना ही होगा।
जिस के बारे कहा जाता हे कुतुबद्दीन ने 1206से 1210 की बीच क़ुतुब मीनार का निर्माण कराया जिस के नाम से क़ुतुब मीनार (क़ुवतुलु इस्लाम मस्जित)पड़ा जिस की उचाई 234 फुट है।
लेकिन आप पता ना हो क़ुतुब मीनार का असली नाम विष्णु स्तंभ,धुव स्तंभ है। जिसका निर्माण वराहमिहिर के मार्गदर्शन में, सम्राट विक्रमादित्य के शासन काल में1600 बर्ष पूर्व खगोलशास्त्र का अध्ययन के लिए बनबाया गया
1191 के अंत में मोहम्मद गौरी ने दिल्ली पर आक्रमण किया,तो पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को पराजित कर दिया,गोरी 1192में दोबारा आक्रमण कर के प्रथ्विराज को हरा दिया,तब कुतुबुद्दीन गोरी का सेनापति था.
1206 में मोहम्मद गोरी ने क़ुतुबुद्दीन को अपना नायाब नियुक्त किया और 1206 के अंत में गौरी की मृत्यु के वाद कुतुबुद्दीन ने गद्दी संभाली, और तमाम विरोधियों को ख़तम करने में उसको लाहोर में दो साल से जाधा का समय लग गया। और 1210 में उस की मृत्यु लाहोर में उस की मृत्यु पोलो खेलते समय घोड़े से गिर कर हुई।
कहा जाता है क़ुतुब मीनार को ,कुवैतूल इस्लाम मस्जित और अजमेर में अढ़ाई दिन का झोपड़ा नामक मस्जित उसी ने वनवाई थी।
अब ध्यान देने बाली बात ये है,कुतुबुद्दीन ने 1206 से ले कर 1210 तक मात्र 4 बर्ष राज्य किया जिसमे दो साल उसको विरोधियो को ख़तम कर में लग गए। तो उस ने क़ुतुब मीनार का निर्माण कब करा दिया?
कुछ जगह ये भी लिखा हे कि क़ुतुब मीनार का निर्माण 1193 के अंत में शुरू हुआ, उस के बाद कुतुबुद्दीन ने मात्र एक मंजिल बनबाई उसके ऊपर की तीन मंजिल उसके परवर्ती बादशाह इल्तुतमिश ने बनबाई और उर उसके ऊपर की शेष मंजिले बाद में बानी,
इस बात पर ध्यान दो अगर 1193 में कुतुबुद्दीन ने मीनार बनवाना शुरुर किया होगा तो उसका नाम बादशाह गोरी के नाम पर क्यों नहीं रखा, कोई बादशाह अपने सेनापति के नाम पर किसी इमारत का नाम क्यों रखने लगा।
उस ने लिखवाया की उस ने स्थान पर बने 27 मंदिरो को तोड़ कर उस के मलबे से मीनार बनवाई गयी, तो क्या किसी ईमारत एक तरह से मलबे से बनाया जा सकता है? जब की गिराई गये भवन का हर पत्थर स्थाननुसार अलग अलग नाप का पूर्व निर्धारित होता है।देने क लिए यह मीनार बानी तो क्या इतनी उचाई से अबाज निचे सुनाई दे सकती है?
क्यों तब लाउड स्पीकर नहीं थे।
अब हम आप को बताते हे सच क्या हे। जहाँ क़ुतुब मीनार परिसर हे वह महरोली कहा जाता है,महरोली वराहमिहिर के नाम पर बसाया गया था जो की सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक और खगोलशास्त्री थे, उन्हों ने उस स्थान को के चारो ओर नक्षत्रो के अध्यकन के लिए 27 कलापूर्ण परिपार्थि का निर्माण करवाया था।
मीनार के स्तंभों पर बहुत ही वारीक कारीगरी के साथ देवी देवताओ के चित्र भी उकेररे गये थी,जिन्हें नष्ट करवाये जाने पर भी कही कही देखने को आज भी मील जातेँ है।कुछ संस्कृत भाषा के अंश भी स्तम्भ और दीवारो पर आज भी देखे और पड़े जा सक्ते है। जो निर्माण के समय पर ही उकेरे गए लगते है। मीनार की सात मंजिले थी सबसे ऊपर की मंजिल पर ब्रमा जी की हाथ में वेद लिए हुए मूर्ति थी,जिसे तोड़ दिया गया.उससे निचे की मंजिल पर विष्णु जी के साथ कुछ और भी मूर्तियां थी, वह भी हटा दिए होगें,
और अब पांच मंजिले ही शेष है।
हम ने आप को पहले ही बता दिया इस नाम विष्णु ध्वज , विष्णु स्तम्भ ,ध्रुव स्तम्भ से चर्चित था। परिसर में खड़ा लौह स्तम्भ सबसे बड़ा प्रमाण है जिस पर लिखा हुआ ब्राम्ही भाषा का लिखा, जिस में लिखा है की यह स्तम्भ जो गरुड़ ध्वज कहा गया है वो सम्राट चंद्रगुप्त बिक्रमदित्य के राज्य काल में 380-414 ईसवी स्थापित किया गया था।
लौह स्तम्भ की कुछ खास बातें यह स्तम्भ 7 मीटर ऊँचा और लगभग 6 तन बजन का है,इस लौह स्तम्भ की खास बात ये है की इसमे आज तक जंग नहीं लगा हैं।इस पर लिखे संसकृत में अंकित कुछ वाक्य कहते है,की इसे चन्द्रगुप्त ने भगवान विष्णु के लिये समर्पित कर दिया था। साथ ही संसकृत में लिखी पंक्तिया स्पष्ट रूप यह बताती हे की बाह्लीक युद्ध के पश्चात् उन्होंने यह स्तम्भ वनवाय। उन के काल में या स्तम्भ समय बताने का काम करता था।
तो आप समज ही गए होगें की इस का सारा सारा श्रेय सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के राज्य काल में खगोलशास्त्री वराहमिहिर को जाता है। न की कुतुबुद्दीन को उस ने मात्र इतना किया भगवान विष्णु की के मंदिर को तोड़ दिया और उस का नाम कूतूब मीनार(कुवातुल इस्लाम मस्जित ) रख दिया, स्तम्भ से हिन्दू संकेतो को छुपा के उन पर अरबीभासा में लिखवा दिया और खुद को श्रेय दिया ।।।
हमारे एक मित्र ने पोस्ट की थी हमने वहाँ से काॅपी कि ताकि सच्चाई सब को पता चले आप भी सेयर जरूर करें ॥

Friday, March 25, 2016

अंगूर के फायदे

अंगूर प्राकृतिक फल है। यह हर तरह से आपके लिए फायदा करता है। अंगूर की कई तरह की प्रजातियां हैं। जैसे लंबे अंगूर, काले अंगूर, छोटे अंगूर आदि। इन्ही अंगूरों से किशमिश बनाई जाती है। अंगूर में कैलोरी, फाइबर के साथ-साथ विटामिन सी, ई और के भरपूर मात्रा में पाया जाता है। इसलिए अंगूर प्राकृति का एैसा फल है जिसमें हर तरह के उत्तम गुण हैं जो सेहत और उम्र को बढ़ाने में मददगार होते हैं। इस लेख के माध्यम से आपको अंगूर में छिपे सेहत के राज के बारे में बताया जाएगा जो कई रोगों को दूर करने में आपकी मदद करेगें।


अंगूर में ग्लूकोज, मेग्नीशियम और साइट्रिक आदि जैसे पोषक तत्व मौजूद होते हैं। अंगूर कई रोगों में लाभ देता है जैसे टी बी, कैंसर, रक्त विकार और पारिया जैसे रोगों का अंत करने में लाभदायक है। साथ ही अंगूर का प्रयोग बच्चे, युवा, कमजोर और गर्भवती महिलाओं के लिए भी फायदा करता है।

डायबिटीज
जिन लोगों को डायबिटीज है उनके लिए अंगूर सेवन करना हितकारी है। अंगूर शूगर की मात्रा को कम करता है। खून में मौजूद शूगर को नियंत्रित करने में अंगूर अहम भूमिका निभाता है। 
अंगूर खून की कमी और आयरन की कमी को दूर करता है।

 माइग्रेन

जिन लोगों को माइग्रेन की समस्या है वे सुबह उठकर अंगूर का रस पीयें। एैसा कुछ दिनों तक करने से माइग्रेन की समस्या से निजात मिल सकता है।

 ब्रेस्ट कैंसर

हाल ही में हुए नये शोध में यह बात सामने आई है कि ब्रेस्ट कैंसर जैसी घातक बीमारी को रोकने में अंगूर सेवन एक कारगर उपाय है। साथ ही हर्ट अटैक के रोग से बचने के लिए काले अंगूर का जूस पीने से लाभ मिलता है। काले अंगूर का रस खून के थक्कों को बनने से रोक देता है।
अंगूर का रस पीने से दिल में हो रहे दर्द में आराम मिलता है।

 कब्ज और भूख 

कब्ज को खत्म करने के लिए काली मिर्च और नमक को अंगूर में डालकर सेवन करना चाहिए।
भूख बढ़ाने में भी अंगूर एक कारगर नुस्खा है। विटामिन ए की भरपूर मात्रा होने पर यह भूख को बढ़ाने में मदद करता है।

 खून की कमी                        READ : बादाम के फायदे - पुरूषों के लिये

खून की कमी को दूर करने के लिए एक गिलास अंगूर के जूस में 2 चम्मच शहद मिलकार पीने से खून की कमी पूरी हो जाती है।
अंगूर हीमोग्लोबिन को बढ़ाता है। इसलिए अंगूर का एक गिलास जूस अवश्य पीयें।

 याददास्त

याददास्त को बढ़ाने के लिए अंगूर के रस की 2 चम्मच सुबह और 2 चम्मच शाम को पानी के साथ मिलाकर, खाना खाने के बाद लें। यह आपकी कमजोर याद शक्ति को बढ़ाएगा।

 रक्त स्त्राव

शरीर से खून निकलने से या रक्त स्त्राव होने पर शहद के दो चम्मच एक गिलास अंगूर के  जूस में मिलाकर पीएं। यह रक्त स्त्राव की वजह से हुई खून कमी को दूर करता है।

इनफेक्शन                                   

नियमित रूप से अंगूर का जूस पीने से शरीर की अल्जाइमर और वाइरल जैसे इन्फेक्शन से लड़ने की क्षमता बढ़ जाती है।

फोड़े-फुंसी

त्वचा संबंधित समस्याओं जैसे मुंहासे, फोड व फुंसी आदि को सुखाने का काम करता है अंगूर।

उल्टी होने पर

उल्टी की समस्या हो या जी मिचला रहा हो ऐसे में काली मिर्च और थोड़ा सा नमक को अंगूर के रस में मिलाकर पींए। 

बालों और आंखों को भी स्वस्थ रखता है अंगूर का सेवन।

मुंह के छाले

अंगूर मुंह के छालों से भी मुक्ति दिलता है। अंगूर के रस से कुल्ला करने से मुंह से संबंधित रोग जैसे घाव और छाले दूर हो जाते हैं।

 अंगूर वैदिक दृष्टि से अनोखा फल है। इसलिए अंगूर को किसी न किसी रूप में अपने भोजन में शामिल करें। अंगूर आपको हमेंशा रोगमुक्त रखेगा साथ कई तरह की समस्याओं से भी निजात

Thursday, March 13, 2014

गाय के लिए एंटीवायरस

अहमदाबाद एल डी इंजीनियरिंग कॉलेज के ध्रुव पटेल को जिन्होंने हाल ही में भारतीय पशुपालन को ध्यान में रखते हुए एक ऐसा केमिकल इंजेक्शन तेयार किया है जो पशुओ के लिए एक anti virus का काम करेगा । इस केमिकल इंजेक्शन को तेयार करने में 1 से 2 साल का समय लगा है । यह इंजेक्शन किसी पशु को लगाने के बाद 3 साल तक दूसरा इंजेक्शन लगाने की जरुरत नहीं पड़ती । इस इंजेक्शन की कीमत 100 रूपये से 150 रुपये के आस पास होगी ।
ध्रुव पटेल का कहना है की इस इंजेक्शन की एक विशेषता यह है की यह इंजेक्शन किसी पशु को कोई नुक्सान नहीं पहुचाता और ना ही किसी पशु की कोई उम्र कम करता है । लेकिन अगर वो पशु मर जाता है या मार दिया जाता है तो उसका मॉस जहर बन जाता है जो मॉस खाने वाले इंसान को सिर्फ 4 घंटे में ही ख़त्म कर देता है ।
वैज्ञानिक तेज सिंह जी का कहना है की यह इंजेक्शन गौशाला वालो को फ्री में दिया जायेगा।
ताकि गौमाता पर जो अत्याचार हो रहे है उनके लिए रामबाण सिद्ध होगा । इसके लिए गौशाला वालो को अपना पता register करवाना होगा । ताकि सभी गौशाला वालो और किसानो को लाभ मिल सके । रजिस्टर करवाने के लिए मेल करे ।
ldceahmd@gmail.com पर ....
इस मेसेज को आगे शेयर करे ताकि हर गौशाला वाले इसका लाभ उठा सके ।। 
जय गौ माता की । जय सावरिया श्याम की ।